हवा में जली हुई डीजल और गीली मिट्टी की गंध एक साथ घुली हुई थी, एक ऐसा मिश्रण जो किसी को भी बेचैन कर दे।
बाहर मूसलाधार बारिश बस की छत पर ऐसे बरस रही थी जैसे कोई मुट्ठियों में कंकड़ भरकर फेंक रहा हो।
शंकर ने स्टियरिंग व्हील पर अपनी पकड़ कस ली, उसकी हथेलियों की लकीरों में पसीना और पाप, दोनों छिपे थे।

बस का इंजन किसी बूढ़े जानवर की तरह गुर्राया और फिर एक गहरी, थकी हुई साँस ली।
पीछे, चालीस झुर्रियों वाले चेहरे उम्मीद से चमक रहे थे।
चालीस आत्माएँ, जो अपने जीवन की अंतिम तीर्थयात्रा पर निकली थीं।
इन्हें लगता है ये स्वर्ग की ओर जा रहे हैं।
शंकर ने रियर-व्यू मिरर में देखा।
उसकी आँखों में कोई भाव नहीं था, सिर्फ एक गहरा, काला शून्य।
बेचारे। इन्हें पता ही नहीं कि नर्क का रास्ता यहीं से शुरू होता है।
“बेटा, हम समय पर पहुँच जाएंगे न?”
सामने की सीट पर बैठी एक बुजुर्ग महिला ने पूछा, जिसके दाँत नदारद थे लेकिन मुस्कान पूरी थी।
उसने कांपते हाथों से शंकर की तरफ एक लड्डू बढ़ाया।
“लो बेटा, प्रसाद है। भगवान तुम्हारी रक्षा करे।”
शंकर के होंठों पर एक बहुत ही सधी हुई, अभ्यास की हुई मुस्कान तैर गई।
“फिक्र मत करो माताजी,” शंकर ने लड्डू लेते हुए कहा, उसकी आवाज़ में शहद जैसी मिठास थी।
“मैं आपको आपकी मंज़िल तक पहुँचा कर ही दम लूँगा।”
मंज़िल… शब्द का चुनाव कितना दिलचस्प है।
उसने लड्डू को डैशबोर्ड पर रख दिया।
उसने उसे खाया नहीं।
मुर्दे को खाना खिलाने का क्या फायदा?
बस ने एक झटका लिया और शहर की पक्की सड़कों को पीछे छोड़ दिया।
स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी।
अब सामने सिर्फ और सिर्फ अंधेरा था।
बस के अंदर, किसी ने ढोलक पर थाप दी।
“राम नाम अति मीठा है…”
भजन शुरू हो गए थे।
तालियों की गड़गड़ाहट और ढोलक की आवाज़ ने इंजन के शोर को दबा दिया।
शंकर का बायां हाथ गियर लीवर पर था, और दायां हाथ जेब में रखे फोन पर।
फोन वाइब्रेट हुआ।
सिर्फ एक बार।
सिग्नल।
शंकर ने नज़र बचाकर फोन निकाला।
स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी, जिससे उसकी आँखें किसी शिकारी जानवर जैसी चमक उठीं।
उधर से कोई आवाज़ नहीं आई, सिर्फ साँस लेने की आवाज़ थी।
“पैकेज लोड हो गया है,” शंकर ने बहुत धीमे स्वर में कहा, इतना धीमे कि पास बैठी माताजी भी न सुन सकें।
“क्वांटिटी चालीस। क्वालिटी… पुरानी है, लेकिन काम चल जाएगा।”
उधर से एक खुरदुरी हँसी आई।
“काली घाटी के मोड़ पर मिलो। रास्ता साफ है।”
फोन कट गया।
शंकर ने फोन वापस जेब में डाल लिया।
बस अब शहर की सीमा पार कर चुकी थी।
खिड़की के बाहर अब इमारतें नहीं, बल्कि घने जंगल के साये दिख रहे थे।
पेड़ ऐसे लग रहे थे जैसे वे सड़क की ओर झुककर बस को निगलने का इंतज़ार कर रहे हों।
यात्री अभी भी भजन में मग्न थे।
उनकी आँखें बंद थीं, हाथ जुड़े हुए थे।
वे भक्ति के नशे में थे।
और शंकर? वह शक्ति के नशे में था।
विश्वास… दुनिया का सबसे खतरनाक नशा है।
ये लोग मुझ पर भगवान से भी ज्यादा भरोसा कर रहे हैं।
क्योंकि स्टियरिंग भगवान के हाथ में नहीं, मेरे हाथ में है।
अचानक, एक जोर का झटका लगा।
बस एक गहरे गड्ढे में गिरी और फिर उछल पड़ी।
भजन एक पल के लिए रुक गया।
“अरे भाई, देख के चलाओ!” पीछे से एक बुजुर्ग ने चिल्लाकर कहा।
शंकर ने शीशे में देखा और माफ़ी मांगते हुए हाथ उठाया।
“माफ़ करना दादाजी, रास्ता थोड़ा खराब है आगे।”
रास्ता खराब नहीं है, दादाजी। रास्ता तो अब खत्म होने वाला है।
उसने एक्सीलेटर पर दबाव बढ़ाया।
स्पीडोमीटर की सुई 60 को पार कर गई।
फिर 70।
पुरानी बस का ढांचा कांपने लगा।
खिड़कियां खड़खड़ाने लगीं जैसे वे भाग जाना चाहती हों।
बारिश अब और तेज़ हो गई थी।
वाइपर कांच पर पागलों की तरह नाच रहे थे, लेकिन फिर भी धुंधलापन साफ़ नहीं हो रहा था।
ठीक वैसे ही जैसे इन यात्रियों की किस्मत धुंधली थी।
सामने एक बोर्ड आया, जिस पर जंग लगा हुआ था।
‘काली घाटी – 10 किमी’
शंकर की पुतलियां फैल गईं।
उसके शरीर में एड्रेनालाईन दौड़ने लगा।
यह वो जगह थी जहाँ मोबाइल नेटवर्क भी दम तोड़ देता था।
और इंसान भी।
बस के अंदर का माहौल बदल रहा था।
बाहर का अंधेरा अब अंदर भी रेंगने लगा था।
कुछ यात्रियों को ठंड लगने लगी थी।
उन्होंने अपनी शॉलें कस लीं।
लेकिन यह ठंड मौसम की नहीं थी।
यह मौत की आहट थी।
शंकर ने एक सिगरेट निकाली, लेकिन जलाई नहीं।
उसने बस उसे अपने होंठों के बीच दबा लिया।
कच्चा शिकार।
उसे याद आया जब उसने पहली बार यह किया था।
तब उसके हाथ कांपे थे।
लेकिन अब?
अब यह बस एक काम था।
जैसे कोई डाकिया चिट्ठी पहुँचाता है।
बस फर्क इतना था कि वह चिट्ठियाँ नहीं, रूहें पहुँचाता था।
“बेटा, क्या हम सही रास्ते पर हैं?”
वही माताजी फिर बोलीं।
इस बार उनकी आवाज़ में डर था।
“बाहर बहुत अंधेरा है, कुछ दिखाई नहीं दे रहा।”
शंकर ने एक हाथ स्टियरिंग से हटाकर उनके कंधे पर रखा।
उसका स्पर्श ठंडा था, बर्फ जैसा।
“माताजी, कभी-कभी सही मंज़िल पाने के लिए अंधेरे से गुज़रना पड़ता है।”
उसका जवाब दार्शनिक था, लेकिन उसका मतलब भयानक था।
माताजी ने सिर हिलाया, मानो समझ गई हों, और वापस अपनी सीट पर टिक गईं।
सो जाओ।
अगली बार जब आँख खुलेगी, तो यह बस नहीं होगी।
बस अब पहाड़ी चढ़ाई शुरू कर चुकी थी।
इंजन जोर लगा रहा था, चीख रहा था।
हर मोड़ पर बस एक तरफ झुक जाती।
नीचे गहरी खाई थी, जिसका कोई अंत नहीं दिखता था।
काली घाटी।
बदनाम।
शापित।
और शंकर का खेल का मैदान।
उसने हेडलाइट्स को हाई बीम पर कर दिया।
रोशनी की दो लंबी लकीरें कोहरे को चीरती हुई आगे बढ़ीं।
जैसे वे किसी चीज़ को ढूंढ रही हों।
पीछे भजन की आवाज़ धीमी हो गई थी।
ज्यादातर यात्री अब ऊंघ रहे थे।
थकान और बस की लयबद्ध गति ने उन्हें सुला दिया था।
शंकर ने एक गहरी साँस ली।
उसने अपनी कलाई घड़ी पर नज़र डाली।
रात के 2:00 बज रहे थे।
शैतान का पहर।
उसने धीरे से ब्रेक पर पैर रखा, बस रफ़्तार कम करने के लिए नहीं, बल्कि चेक करने के लिए।
ब्रेक सही काम कर रहे थे।
फिलहाल।
लेकिन कब तक?
उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान आ गई।
उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक छोटा सा रिमोट जैसा डिवाइस टटोला।
बस एक बटन।
और यह बस एक जलती हुई चिता बन जाएगी।
लेकिन अभी नहीं।
क्लाइंट को माल ‘साबुत’ चाहिए था।
सामान नहीं, इंसान।
अंग।
यादें।
जेवर।
सब कुछ बिकेगा आज रात।
शंकर ने फिर से रियर-व्यू मिरर में देखा।
एक बूढ़ा आदमी जाग रहा था।
वह शंकर को ही घूर रहा था।
उसकी आँखों में नींद नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा शक था।
शंकर ने नज़रें नहीं हटाईं।
उसने उस बूढ़े की आँखों में सीधे देखा।
एक चुनौती की तरह।
क्या देख रहे हो, बाबा?
अपनी मौत का चेहरा पहचानते हो?
बूढ़े ने नज़रें झुका लीं।
डर गया।
शंकर की छाती गर्व से फूल गई।
इस लोहे के पिंजरे में, वह राजा था।
और ये सब उसकी प्रजा, जिन्हें वह बलि वेदी पर ले जा रहा था।
सड़क अब संकरी हो गई थी।
इतनी संकरी कि एक बार में सिर्फ एक ही गाड़ी निकल सके।
एक तरफ पहाड़, दूसरी तरफ मौत।
और बीच में शंकर, जो दोनों से ज्यादा खतरनाक था।
उसने गुनगुनाना शुरू किया।
वही भजन जो पीछे बज रहा था।
“रघुपति राघव राजा राम…”
लेकिन उसके सुरों में भक्ति नहीं, उपहास था।
उसने गियर बदला।
बस ने एक और तीखा मोड़ लिया।
टायरों ने गीली सड़क पर चीखने की आवाज़ की।
कुछ यात्री हड़बड़ा कर जाग गए।
“क्या हुआ? आ गए क्या?”
“बस पहुँचने ही वाले हैं,” शंकर ने कहा।
उसकी आवाज़ अब और भी भारी हो गई थी।
“काली घाटी का स्वागत द्वार आने वाला है।”
उसने फोन को दोबारा निकाला।
कोड भेजा: “5 मिनट।”
अब वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
न तो इन यात्रियों के लिए।
और शायद, न ही शंकर के लिए।
बस अंधेरे को चीरती हुई उस अंतिम मोड़ की तरफ बढ़ रही थी, जहाँ विश्वास का भ्रम टूटने वाला था।
और खौफ का असली चेहरा सामने आने वाला था।
घड़ी की सुइयां रात के दो बजे पर आकर थम गई थीं, मानो वक्त ने खुद अपनी सांसें रोक ली हों।
बस के पहिए अचानक एक जोरदार झटके के साथ चीख पड़े, और जंगल की भयानक खामोशी टूट गई।
बोनट से उठता हुआ सफेद धुआं कांच पर ऐसे छा गया, जैसे किसी ने बस की आंखों पर कफन डाल दिया हो।
इंजन की वो आखिरी सिसकी सन्नाटे में गूंजती रही।
बस के अंदर सो रहे यात्रियों के सिर अगली सीटों से टकराए।
हड़बड़ाहट। नींद का टूटना। और फिर वही सवाल—”क्या हुआ? हम कहाँ हैं?”
लेकिन ड्राईवर की सीट पर बैठे शंकर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने इत्मीनान से चाबी घुमाकर इंजन पूरी तरह बंद कर दिया।
“इंजन गरम हो गया है,” उसकी आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी, जैसे वो किसी मशीन की खराबी नहीं, बल्कि किसी की मौत की खबर सुना रहा हो।
रोहन, जो खिड़की के पास बैठा था, उसने बाहर झांकने की कोशिश की।
बाहर कुछ नहीं था। सिर्फ घना, काला, निगलता हुआ अंधेरा।

जंगल के वो पेड़ पहरेदारों की तरह खड़े थे, जो किसी को बाहर जाने नहीं देंगे।
तभी, झाड़ियों में सरसराहट हुई।
हवा नहीं चल रही थी। पत्ते अपने आप नहीं हिलते।
रोहन का दिल जोर से धड़कने लगा। उसका छठा इंद्रिय चीख-चीख कर कह रहा था—खतरा।
अचानक, टॉर्च की तेज रोशनी ने बस के कांच को चीर दिया।
रोशनी के पीछे परछाइयां थीं। एक नहीं, दो नहीं… पूरे छह लोग।
उनके चेहरों पर इंसानी खाल नहीं, बल्कि काले कपड़े के नकाब थे।
हाथों में लोहे की रॉड और देसी कट्टे ऐसे चमक रहे थे, जैसे वो प्यासे हों।
“दरवाजा खोलो!” बाहर से एक भारी, खुरदरी आवाज़ आई।
बस के अंदर चीख-पुकार मच गई।
एक महिला रोने लगी, अपने बच्चे को छाती से ऐसे चिपका लिया जैसे उसे अपने शरीर में वापस समा लेना चाहती हो।
बुज़ुर्ग कांपने लगे। किसी ने हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया।
लेकिन शंकर…
शंकर अपनी जगह से नहीं हिला।
उसने न तो खिड़की का कांच चढ़ाया, न ही बस स्टार्ट करने की कोशिश की।
उसका बायां हाथ स्टेयरिंग व्हील पर ढीला पड़ा था।
जैसे वो ट्रैफिक सिग्नल पर रुका हो, न कि मौत के मुहाने पर।
“ये क्या कर रहा है? भगाता क्यों नहीं?” रोहन ने मन ही मन चीखा।
तभी, बस का दरवाजा एक झटके के साथ खुला।
ठंडी हवा के साथ दहशत बस के अंदर घुस आई।
नकाबपोश लुटेरे अंदर चढ़े। जूतों की भारी आवाज़ ने फर्श को कंपा दिया।
“जो कुछ है निकाल दो! वरना गोली मार देंगे!”
उनकी आवाज़ में रहम की कोई गुंजाइश नहीं थी।
पहला वार एक नौजवान पर हुआ। कट्टे की बट उसके सिर पर पड़ी।
खून की धार फूटी। बस में बैठी हर रूह कांप गई।
गहने उतरने लगे। पर्स खाली होने लगे।
सोने की चेन खींचे जाने पर गर्दनों पर खरोंचें आ गईं।
रोहन ने अपनी घड़ी उतारकर सीट के नीचे सरका दी।
उसकी नज़रें बार-बार सामने वाले शीशे पर जा रही थीं।
वहां उसे शंकर का चेहरा दिखाई दे रहा था।
और वो चेहरा… वो चेहरा इंसान का नहीं लग रहा था।
इतनी अफरातफरी, इतना शोर, इतना खून…
फिर भी शंकर की पलकें नहीं झपकीं।
उसने अपनी जेब से बीड़ी का बंडल निकाला।
इस वक्त? जब लोगों की जान पर बनी है?
एक लुटेरा शंकर के पास से गुजरा।
रोहन की सांस अटक गई। उसे लगा अब शंकर को मार पड़ेगी।
लेकिन लुटेरे ने शंकर को छुआ तक नहीं।
जैसे शंकर वहां मौजूद ही न हो। या फिर…
या फिर वो जानता हो कि शंकर कौन है।
एक भयानक अहसास रोहन के दिमाग में कौंधा।
ये लूट नहीं थी। ये शिकार था।
और शंकर बस का ड्राईवर नहीं था।
वो वो गड़रिया था जो भेड़ों को कसाईखाने तक ले आया था।
पीछे की सीट पर बैठी लड़की ने अपनी बालियां देने से मना किया।
लुटेरे ने उसकी कलाई मरोड़ दी। चीख से बस गूंज उठी।
शंकर ने माचिस जलाई।
लौ की रोशनी में उसका चेहरा एक पल के लिए चमका।
उसकी आँखों में डर नहीं था। अफ़सोस नहीं था।
वहाँ सिर्फ एक वीरान सन्नाटा था। एक गहरी, काली झील जैसा सन्नाटा।
“कैसे बैठ सकता है कोई इतना शांत?” रोहन का जमीर उसे झकझोर रहा था।
लुटेरे एक-एक करके आगे बढ़ रहे थे।
वे शंकर की सीट के बगल में रखे पैसों के बैग को हाथ भी नहीं लगा रहे थे।
रोहन समझ गया।
ये इंजन गरम नहीं हुआ था।
ये बस खराब नहीं हुई थी।
इसे रोका गया था। ठीक इसी जगह। ठीक इसी वक्त।
शंकर ने बीड़ी का एक लंबा कश लिया और धुआं बाहर छोड़ा।
धुआं शीशे से टकराकर वापस उसकी तरफ आया।
उस धुएं के बीच, रोहन को लगा कि शंकर मुस्कुरा रहा है।
एक बहुत ही बारीक, ना दिखाई देने वाली मुस्कान।
जैसे कोई अपना काम पूरा होने पर संतुष्ट होता है।
बस के अंदर सिसकियां अब धीमी हो चुकी थीं।
लोग लूट चुके थे। अब वे बस जिंदा बचना चाहते थे।
लेकिन रोहन को अब अपने सामान की चिंता नहीं थी।
उसे उस शख्स से डर लग रहा था जो उनकी जिंदगी की स्टेयरिंग थामे बैठा था।
बाहर खड़े नकाबपोश शायद चले जाएंगे।
लेकिन शंकर? वो तो यहीं रहेगा। उनके साथ।
बाकी के सफर के लिए।
इस सुनसान, अंधेरे हाइवे पर।
लुटेरों का सरगना बस के दरवाजे पर खड़ा हुआ।
उसने एक बार पीछे मुड़कर शंकर की तरफ देखा।
दोनों के बीच कोई शब्द नहीं बोले गए।
सिर्फ एक नज़र का लेन-देन हुआ।
एक इशारा। एक सहमति।
“हिस्सा,” रोहन के दिमाग ने फुसफुसाया। “ये उसका हिस्सा है।”
लुटेरे अंधेरे में वैसे ही गायब हो गए जैसे आए थे।
पीछे छोड़ गए रोते हुए यात्री और बिखरा हुआ सामान।
बस में फिर से सन्नाटा छा गया। लेकिन ये सन्नाटा पहले से ज्यादा भारी था।
शंकर ने अपनी बीड़ी खिड़की से बाहर फेंकी।
उसने शांत भाव से चाबी घुमाई।
इंजन एक ही बार में स्टार्ट हो गया।
गरम इंजन इतनी जल्दी ठंडा नहीं होता।
रोहन की रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ गई।
शंकर ने गियर बदला।
बस फिर से चल पड़ी, उसी मौत के हाइवे पर।
यात्रियों ने राहत की सांस ली कि लुटेरे चले गए।
लेकिन वे नहीं जानते थे।
असली खतरा बाहर झाड़ियों में नहीं था।
असली खतरा तो अब भी उनके साथ, अगली सीट पर बैठा था।
और रात अभी बहुत बाकी थी।
बारिश की तेज़ बौछारें बस की विंडशील्ड पर हथौड़ों की तरह बज रही थीं, जैसे आसमान खुद इस रात के अंत का ऐलान कर रहा हो।
बाहर का अंधेरा अब गहरा नहीं, बल्कि जानलेवा हो चुका था, जिसमें से मौत की आहट साफ सुनाई दे रही थी।
शंकर ने स्टेयरिंग व्हील पर अपनी पकड़ ढीली कर दी, और उसके चेहरे पर वो डर नहीं था जिसकी उम्मीद पीछे बैठे कांपते हुए मुसाफिर कर रहे थे।
उसके होंठों पर एक हल्की, लगभग अदृश्य मुस्कान तैर गई थी।
ये वो मुस्कान नहीं थी जो खुशी में आती है।
ये वो मुस्कान थी जो एक शिकारी के चेहरे पर तब आती है, जब शिकार खुद चलकर पिंजरे में आ जाता है।
बस का हाइड्रोलिक दरवाज़ा एक डरावनी आवाज़ के साथ खुला।
हवा के ठंडे झोंके के साथ, जंगल की सड़ांध और गीली मिट्टी की गंध अंदर घुस आई।
सामने खड़ा था विक्रम।
इस इलाक़े का सबसे खूंखार डकैत, जिसके नाम से ही हाइवे का खून जम जाता था।
उसके हाथ में एक पुरानी, लेकिन घातक राइफल थी, और पीछे उसके चार साथी, चेहरे पर कपड़े बांधे, लाठियां और कट्टे लिए खड़े थे।
बस के अंदर की हवा जम गई।
किसी ने सांस लेने की भी जुर्रत नहीं की।
पीछे बैठी एक बूढ़ी औरत की सिसकी, सन्नाटे में किसी कांच के टूटने जैसी लगी।
मेरे दिल की धड़कनें शांत थीं।
बहुत शांत।
जैसे तूफ़ान से पहले का समुद्र होता है।
विक्रम भारी कदमों से बस की सीढ़ियां चढ़ा।
उसकी आँखों में जीत का नशा था।
उसे लग रहा था कि आज रात का राजा वही है।
“इंजन बंद कर, ड्राइवर!” विक्रम की आवाज़ गूंजी, जैसे किसी फटे हुए ढोल से निकली हो।
मैंने धीरे से चाबी घुमाई।
इंजन की घरघराहट बंद हो गई।
अब सिर्फ बारिश का शोर था।
और विक्रम की भारी सांसें।
वो मेरे करीब आया, इतना करीब कि मैं उसकी बासी शराब की बदबू महसूस कर सकता था।
उसने राइफल की नली मेरी कनपटी पर रख दी।
ठंडी धातु मेरी त्वचा को जला रही थी।
“नीचे देख,” उसने गुर्राते हुए कहा। “और जो कुछ भी कीमती है, सब झोले में डाल दे।”
मुसाफिरों ने अपनी अंगूठियां, चेन और पर्स निकालने शुरू कर दिए।
रोने और गिड़गिड़ाने की आवाज़ें तेज़ हो गईं।
लेकिन मैंने अपनी नज़रें नहीं झुकाईं।
मैंने सीधे विक्रम की आँखों में देखा।
उसकी पुतलियाँ सिकुड़ गईं।
उसे उम्मीद थी कि मैं भीक मांगूंगा।
जान की भीक।
रहम की भीक।
लेकिन उसे मेरी आँखों में सिर्फ एक गहरा शून्य दिखाई दिया।
“तुझे सुनाई नहीं देता क्या?” विक्रम चिल्लाया, और उसने राइफल से मेरे कंधे पर वार किया।
दर्द हुआ, लेकिन मैंने उफ तक नहीं की।
मैं हंसा।
एक बहुत ही धीमी, सूखी हंसी।
बस में सन्नाटा छा गया।
विक्रम रुक गया।
उसका हाथ कांपने लगा।
एक निहत्था ड्राइवर, मौत के सामने हंस रहा था?
यह उसके गणित से बाहर था।
“पागल हो गया है क्या?” विक्रम ने झिड़कते हुए कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में अब वो पहले वाला दम नहीं था।
“विक्रम…” मैंने उसका नाम लिया।
उसने चौंक कर मुझे देखा।
“तू मेरा नाम कैसे जानता है?”
मैंने अपनी जेब से सिगरेट का एक पैकेट निकाला।
लाइटर जलाया।
लौ की रोशनी में मेरा चेहरा चमक उठा।
“मैं तेरा नाम ही नहीं जानता, विक्रम,” मैंने धुआं छोड़ते हुए कहा।
“मैं यह भी जानता हूँ कि आज रात तेरी आखिरी रात है।”
विक्रम ने पीछे हटते हुए राइफल लोड की।
“तेरी जुबान बहुत चलती है, साले। अभी भेजे का दही बनाता हूँ।”
“देर कर दी तूने,” मैंने घड़ी की तरफ देखा। “पूरे तीन मिनट लेट है तू।”
विक्रम का माथा ठनका।
उसने बाहर अंधेरे में देखा।
कुछ अजीब था।
जंगल के जानवर शांत हो चुके थे।
बारिश की आवाज़ के अलावा, सब कुछ खामोश था।
बहुत ज्यादा खामोश।
“क्या बकवास कर रहा है?” विक्रम चिल्लाया, लेकिन उसकी आँखों में अब खौफ तैरने लगा था।
“तुझे क्या लगा, विक्रम? यह बस खराब हुई थी?”
मैं अपनी सीट से खड़ा हो गया।
मेरा कद उससे बड़ा लग रहा था, या शायद उसका डर उसे छोटा कर रहा था।
“मैंने बस रोकी थी,” मैंने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा।
“यहीं पर। इसी वक़्त।”
“क्यों?” उसका गला सूख गया था।
“चारा,” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
“शेर को फंसाने के लिए बकरी को बांधना पड़ता है।”
“ये तीर्थयात्री… ये बच्चे… ये सब?”
“ये सब बस एक परदा थे,” मैंने कड़वाहट से कहा। “असली निशाना तो तू था।”
विक्रम को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है।
पांच साल पहले, इसी विक्रम ने मेरे भाई की बस को लूटा था।
और उसे ज़िंदा जला दिया था।
उस दिन मैंने कसम खाई थी।
कि मैं कानून का इंतज़ार नहीं करूँगा।
मैं खुद कानून बनूँगा।
“भागो!” विक्रम अपने साथियों की तरफ चिल्लाया। “ये जाल है!”
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

अचानक, जंगल का अंधेरा चीरते हुए दर्जनों हाई-बीम सर्चलाइटें जल उठीं।
रोशनी इतनी तेज़ थी कि बस के अंदर दिन जैसा उजाला हो गया।
मुसाफिरों ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
विक्रम और उसके साथी रोशनी में अंधे हो गए।
“हथियार डाल दो! तुम चारों तरफ से घिर चुके हो!”
लाउडस्पीकर पर गूंजी वो आवाज़ पुलिस की नहीं थी।
वो आवाज़ कमांडो यूनिट की थी।
एस.टी.एफ (स्पेशल टास्क फोर्स)।
मैंने इस दिन के लिए तीन साल पुलिस को मुखबिरी की थी।
उन्हें विक्रम की हर चाल, हर ठिकाने की खबर दी थी।
सिर्फ इस शर्त पर कि उसे पकड़ने का मौका मुझे मिलेगा।
विक्रम ने खिड़की से बाहर फायर किया।
जवाब में, जंगल से गोलियों की बौछार आई।
बस के टायरों के पास की ज़मीन छलनी हो गई।
विक्रम के साथी डर के मारे ज़मीन पर लेट गए।
लेकिन विक्रम अभी भी खड़ा था।
अहंकार इंसान को अंधा कर देता है।
वो मेरी तरफ मुड़ा।
“तूने पुलिस बुलाई?” उसने नफरत से थूका।
“पुलिस तो बस कागज़ी कार्यवाही के लिए है, विक्रम,” मैंने अपनी सीट के नीचे से एक पुरानी रिवॉल्वर निकाली।
यह मेरे भाई की रिवॉल्वर थी।
जली हुई, लेकिन अभी भी काम करती थी।
“हिसाब तो मुझे करना है।”
बाहर एस.टी.एफ. के जवान बस को घेरते हुए आगे बढ़ रहे थे।
उनकी बूटों की आवाज़, मौत की ताल जैसी थी।
विक्रम ने अपनी राइफल मेरी तरफ तानी।
लेकिन मैंने ट्रिगर पहले दबा दिया।
सिर्फ एक गोली।
उसके कंधे पर।
राइफल उसके हाथ से छूट कर गिर गई।
वो दर्द से कराहता हुआ घुटनों के बल गिर पड़ा।
वही घुटने, जिन पर वो दूसरों को झुकाता था।
मुसाफिरों के चेहरों पर अब डर की जगह अविश्वास था।
वो ड्राइवर, जिसे वो एक साधारण आदमी समझ रहे थे, वो दरअसल यमराज का दूत था।
मैं विक्रम के पास गया और उसके बालों को पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाया।
“याद है?” मैंने उसके कान में फुसफुसाया। “पाँच साल पहले। हाइवे 24। नीली बस।”
विक्रम की आँखों में पहचान की चमक आई।
और उसके साथ ही मौत का खौफ।
“वो… वो तेरा भाई था?” वो हकलाया।
“हाँ,” मैंने कहा। “और आज उसकी आत्मा को शांति मिलेगी।”
बाहर से कमांडोज़ ने दरवाज़ा तोड़ दिया।
“हैंड्स अप!”
लाल लेज़र डॉट्स विक्रम के सीने पर नाच रहे थे।
मैंने अपनी रिवॉल्वर धीरे से फर्श पर रख दी।
और अपने हाथ ऊपर कर दिए।
लेकिन मेरे चेहरे पर जीत की खुशी नहीं थी।
सिर्फ एक खालीपन था।
बदला पूरा हो गया था, लेकिन भाई वापस नहीं आने वाला था।
विक्रम को हथकड़ी पहनाते हुए घसीटा जा रहा था।
वो मुझे घूर रहा था, जैसे यकीन नहीं कर पा रहा हो कि एक मामूली ड्राइवर ने उसका पूरा साम्राज्य ढहा दिया।
बस के मुसाफिर अब भी सदमे में थे।
बारिश अब भी हो रही थी।
लेकिन तूफ़ान मेरे अंदर थम चुका था।
एस.टी.एफ. का ऑफिसर मेरे पास आया।
“अच्छा काम किया, शंकर,” उसने कहा। “लेकिन बहुत जोखिम भरा था।”
मैंने बस के उन डरे हुए चेहरों की तरफ देखा।
“जोखिम तो ज़िंदगी है, सर,” मैंने धीरे से कहा। “मौत तो बस एक मंज़िल है।”
हाइवे का वो काला राज़ आज खुल चुका था।
मौत के हाईवे का सफर खत्म हो गया था।
लेकिन मेरा सफर… शायद अब शुरू हुआ था।
हवा में बारूद की गंध अभी भी ताज़ा थी, बारिश की बूंदों के साथ मिलकर एक अजीब सी महक पैदा कर रही थी।
सड़क पर फैला खून डामर के कालेपन को और गहरा, और भयावह बना रहा था।
शंकर अपनी सीट पर वापस बैठा, उसके हाथ कांप नहीं रहे थे, बस स्टीयरिंग व्हील पर उसकी पकड़ मौत जैसी सख्त थी।
बाहर का मंज़र किसी युद्ध के मैदान जैसा था, जहाँ अब सिर्फ खामोशी का राज था।
गिरोह खत्म हो चुका था। नरसिम्हा और उसके गुर्गे बेजान पड़े थे।
लेकिन बस के अंदर का सन्नाटा बाहर की खामोशी से भी ज्यादा भारी था।
(क्या मैंने सही किया? या मैंने अपनी आत्मा का आखिरी टुकड़ा भी आज बेच दिया?)
शंकर ने रियरव्यू मिरर में देखा।
तीर्थयात्री अपनी सीटों के नीचे से धीरे-धीरे सिर उठा रहे थे।
उनकी आँखों में अब मौत का डर नहीं था।
वहाँ कुछ और था। कुछ ऐसा जो डर से भी बदतर था।
संदेह। अविश्वास। और एक खौफनाक समझ।
(वे मुझे देख रहे हैं। एक रक्षक की तरह नहीं… एक कसाई की तरह।)
एक बूढ़े यात्री की नज़र शंकर की नज़र से मिली।
उसकी आँखों में सवाल चीख रहे थे।
‘तुम जानते थे, है ना? तुम जानते थे कि वे यहाँ होंगे।’
शंकर ने नज़रें फेर लीं।
उसने चाबी घुमाई। इंजन एक घायल जानवर की तरह गुर्राया।
(हाँ, मैं जानता था। मैंने तुम्हें चारे की तरह इस्तेमाल किया। नरसिम्हा को बाहर निकालने के लिए।)
बस के पहिये हिले, और टायरों ने गीली सड़क पर एक लकीर खींच दी।
वे आगे बढ़े, उन लाशों को पीछे छोड़ते हुए जो अब सिर्फ इतिहास का हिस्सा थीं।
लेकिन बस के अंदर का माहौल बदल चुका था।
कुछ घंटे पहले यहाँ ‘जय भोलेनाथ’ के जयकारे गूंज रहे थे।
भजन और कीर्तन से हवा पवित्र थी।
और अब?
अब यहाँ सिर्फ साँसों की आवाज़ थी। भारी, डरी हुई साँसें।
कोई एक शब्द नहीं बोल रहा था।
बच्चों को उनकी माओं ने कसकर छाती से लगा रखा था, जैसे कोई अदृश्य राक्षस अभी भी बस में मौजूद हो।
और शायद… वह राक्षस ड्राइविंग सीट पर ही बैठा था।
(इनकी खामोशी मेरे कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रही है।)
शंकर का अतीत, जिसे उसने सालों से दफना रखा था, आज सतह पर आ गया था।
उसने बंदूक चलाना नहीं भूला था। उसने निशाना साधना नहीं भूला था।
ये तीर्थयात्री… ये साधारण लोग… उन्होंने आज शंकर का वह रूप देखा था जो इंसानी नहीं था।
वे समझ नहीं पा रहे थे कि भगवान का शुक्रिया अदा करें या अपनी किस्मत पर रोएं।
जान तो बच गई, लेकिन मासूमियत मर गई।
सड़क अंतहीन लग रही थी।
रात का अंधेरा धीरे-धीरे छंट रहा था, लेकिन बस के अंदर का अंधेरा गहराता जा रहा था।
हर मील के साथ, दूरी बढ़ रही थी—रास्ते की नहीं, बल्कि शंकर और उन लोगों के बीच की।
(मैं उन्हें मंजिल तक पहुंचाऊंगा। यही मेरा वादा था। बस यही मेरा मोक्ष है।)
धीरे-धीरे, क्षितिज पर एक धुंधली रोशनी दिखाई दी।
पहाड़ी के ऊपर मंदिर का शिखर।
सुवह की पहली किरण, लेकिन उसमें कोई उल्लास नहीं था।
वह एक गवाह की तरह उगी थी, उदास और फीकी।
बस मंदिर के प्रांगण में रुकी।
इंजन बंद हुआ। सन्नाटा और भी गहरा हो गया।
शंकर अपनी सीट से नहीं उठा।
उसने बस दरवाज़ा खोल दिया।
ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया, जिसमें अगरबत्ती और फूलों की महक थी।
लेकिन किसी को राहत महसूस नहीं हुई।
यात्री एक-एक करके उतरने लगे।
उनके पैर कांप रहे थे।
किसी ने ड्राइवर की तरफ मुड़कर नहीं देखा।
न ‘धन्यवाद’, न ‘शुक्रिया’, न कोई शिकायत।
वे बस भागना चाहते थे। उस बस से। उस याद से। उस आदमी से।
(जाओ। अपने भगवान के पास जाओ। मेरे लिए वहाँ कोई जगह नहीं है।)
आखिरी यात्री, एक छोटी बच्ची, उतरते समय रुकी।
उसने मासूमियत से शंकर की तरफ देखा।
उसकी आँखों में डर नहीं था, बस एक गहरा असमंजस था।
उसकी माँ ने उसका हाथ खींचा और उसे जल्दी से बाहर ले गई।
शंकर अकेला रह गया। खाली बस में।
उसने एक गहरी सांस ली।
डैशबोर्ड पर रखी भगवान की छोटी मूर्ति को देखा।
मूर्ति पर अभी भी खून की एक हल्की छींट लगी थी।
शंकर ने उसे पोंछा नहीं।
यही सच था। भक्ति और रक्त का यह मेल ही उसकी ज़िंदगी थी।

उसने बस को दोबारा स्टार्ट किया।
मंदिर की घंटियाँ बजने लगी थीं, लेकिन वे उसे विदा नहीं कर रही थीं।
वे उसे चेतावनी दे रही थीं।
कोहरे ने बस को घेर लिया।
तीर्थयात्री जब मुड़कर देखेंगे, तो उन्हें बस नहीं दिखेगी।
शंकर गायब हो चुका होगा।
जैसे कोई बुरा सपना सुबह होते ही ओझल हो जाता है।
पीछे छूट गए थे तो बस वो लोग…
वे खामोश गवाह, जो पूरी ज़िंदगी इस सवाल का बोझ ढोएंगे।
कि उस रात उन्हें किसने बचाया था?
एक मसीहा ने? या एक शैतान ने?
और सबसे डरावना सच यह था…
कि शायद दोनों एक ही थे।
बस का शोर कोहरे में विलीन हो गया।
और राजमार्ग… मौत का राजमार्ग… फिर से अपनी अगली शिकार के इंतज़ार में खामोश हो गया।
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