करोड़पति ने 2 रोटी के लिए नौकरानी का पीछा किया, लेकिन सच्चाई जानकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई!

वहम का बवंडर: रईस विक्रम की सोने की लंका और संदेह की काली छाया

शहर की सबसे ऊंची और आलीशान इमारत ‘स्काईलाइन हाइट्स’ के ५०वें माले पर बने पेंटहाउस में, जहाँ बादलों को छूती हुई विशाल कांच की खिड़कियों से पूरी मुंबई एक टिमटिमाते हुए खिलौने जैसी नज़र आती थी, वहां सन्नाटा इतना गहरा था कि गिरती हुई सुई की आवाज़ भी किसी बम विस्फोट जैसी प्रतीत हो सकती थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, आसमान का सीना चीरती हुई बिजली की कड़कड़ाहट रईस विक्रम सिंह राठौर के करोड़पतियों वाले एकांत में खलल डालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन साउंडप्रूफ कांच ने उस शोर को एक मूक चलचित्र बनाकर छोड़ दिया था। विक्रम, अपनी इटालियन लेदर की कुर्सी पर बैठकर, हाथ में लाखों की कीमत वाली स्कॉच का गिलास थामे, अपनी बाज जैसी तीखी नज़रों से डाइनिंग टेबल की ओर देख रहा था। कमरे में एयर कंडीशनर की धीमी गुंजन और महंगे परफ्यूम की खुशबू के बीच, विक्रम का ध्यान अपनी पुरानी नौकरानी कमला पर था, जो पिछले पांच सालों से इस घर के फर्श को अपने पसीने से सींच रही थी। कमला, जिसकी उम्र मुश्किल से चालीस रही होगी मगर गरीबी और कठोर परिश्रम ने उसके चेहरे पर साठ साल की झुर्रियां उकेर दी थीं, डरते-डरते मेज की सफाई कर रही थी। विक्रम की आँखों में वहम का एक ऐसा जाला बुन रहा था जो तर्क और इंसानियत से परे था; उसे लगता था कि उसकी दौलत पर हर गरीब की नज़र है, जैसे गिद्ध मांस पर मंडराते हैं। आज रात, विक्रम का वहम यकीन में बदलने वाला था, क्योंकि उसने अपनी आँखों से कमला को वह करते हुए देख लिया था जो उसकी नज़र में किसी जघन्य अपराध से कम नहीं था—कमला ने कांपते हाथों से, बासी खाने की प्लेट से दो जली हुई रोटियां उठाईं और बड़ी फुर्ती से अपनी मैली साड़ी के पल्लू में छिपा लीं, जैसे वह कोहिनूर हीरा चुरा रही हो। विक्रम के नथुने गुस्से से फड़कने लगे, नसों में दौड़ता हुआ खून खौल उठा, क्योंकि उसे उन दो रोटियों की कीमत की परवाह नहीं थी, बल्कि उसे नफरत थी उस ‘चोरी’ से जो उसके अनुशासन के साम्राज्य को चुनौती दे रही थी।

कार के शीशे से गुस्से में घूरता हुआ अमीर आदमी
कार के शीशे से गुस्से में घूरता हुआ अमीर आदमी

अहंकार की आग और एक रईस का घटिया फैसला

विक्रम सिंह राठौर का उसूल था कि दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता, और जो बिना पूछे लिया जाए, वह चाहे एक तिनका हो या तिजोरी का खजाना, वह चोरी ही कहलाती है। उसका अहंकार, जो उसकी करोड़ों की संपत्ति से भी विशाल था, उसे यह समझने ही नहीं दे रहा था कि शायद उन सूखी रोटियों के पीछे किसी की मजबूरियों का पहाड़ खड़ा हो सकता है। वह अपनी कुर्सी से उठा नहीं, बस अपनी जगह पर जमा रहा, एक शिकारी की तरह जो अपने शिकार को जाल में पूरी तरह फंसने का इंतज़ार करता है। उसके दिमाग में पुरानी बातें घूमने लगीं—कैसे पिछले महीने उसका एक सोने का कफलिंक नहीं मिला था (जो असल में उसकी ही कार की सीट के नीचे गिर गया था), और कैसे रसोइye ने बताया था कि चीनी जल्दी खत्म हो रही है। इन बेतुकी बातों को जोड़कर विक्रम ने अपने दिमाग में कमला को एक शातिर चोर घोषित कर दिया था। वह मन ही मन बड़बड़ाया, “ये गरीब लोग… जितना भी दो, इनका पेट कभी नहीं भरता, मौका मिलते ही डस लेते हैं।” कमला ने जब काम खत्म किया और जाने के लिए अपना पुराना, पेबंद लगा छाता उठाया, तो विक्रम ने उसे रोका नहीं, टोका नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान तैर गई। उसने फैसला कर लिया था कि आज वह सिर्फ इसे नौकरी से नहीं निकालेगा, बल्कि रंगे हाथों पकड़कर पुलिस के हवाले करेगा, ताकि पूरी दुनिया देखे कि विक्रम सिंह राठौर के घर में चोरी करने का अंजाम क्या होता है। उसने अपना कोट उठाया, अपनी मर्सिडीज की चाबी जेब में डाली और बिल्ली जैसी खामोशी से कमला के पीछे जाने के लिए तैयार हो गया। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि जिस दरवाजे से कमला बाहर निकली है, वह उसे शहर की चकाचौंध से दूर, एक ऐसी अंधेरी दुनिया में ले जाने वाला है जहाँ की सच्चाई उसकी रूह को झकझोर कर रख देगी और उसके अस्तित्व के हर कतरे को शर्मिंदा कर देगी।

बारिश, कीचड़ और पीछा करता हुआ एक साया

जैसे ही कमला लिफ्ट से नीचे उतरी और भारी बारिश में इमारत के गेट से बाहर निकली, विक्रम ने अपनी कार को गैराज में ही छोड़ दिया; उसे लगा कि उसकी महंगी गाड़ी उस संकरी बस्ती की गलियों में नहीं जा पाएगी जहाँ कमला जैसे ‘कीड़े-मकोड़े’ रहते हैं, और गाड़ी की आवाज़ से वह सतर्क हो सकती है। उसने अपना काला रेनकोट पहना और पैदल ही उसका पीछा करना शुरू कर दिया। सड़क पर पानी घुटनों तक भरा था, गटर उफान पर थे और शहर की गंदगी सड़कों पर बह रही थी—यह वह मुंबई थी जिसे विक्रम ने हमेशा अपनी कार के काले शीशों के पीछे से देखा था, कभी महसूस नहीं किया था। आज उसके इटालियन जूते कीचड़ में सन रहे थे, बारिश की ठंडी बूंदें सुइयों की तरह चुभ रही थीं, लेकिन बदले और ‘न्याय’ की आग ने उसे रुकने नहीं दिया। कमला, बेचारी, तेज हवाओं से जूझती हुई, अपने पल्लू में छिपी उन दो रोटियों को भीगने से बचाने के लिए उन्हें सीने से चिपकाए हुए, किसी भूत की तरह तेज कदमों से चल रही थी। विक्रम को आश्चर्य हो रहा था कि एक कमजोर औरत इतनी तेज कैसे चल सकती है। वे शहर की मुख्य सड़कों को पीछे छोड़ते हुए, अंधेरी, संकरी और बदबूदार गलियों में दाखिल हो गए, जहाँ स्ट्रीट लाइटें भी जलने से कतराती थीं। हर कदम के साथ विक्रम का गुस्सा घृणा में बदलता जा रहा था—”इतनी गंदगी में लोग कैसे रहते हैं?” वह सोच रहा था, लेकिन उसका ध्यान उस ‘चोरी’ के सबूत को पकड़ने पर था। कमला बार-बार पीछे मुड़कर नहीं देख रही थी, उसका ध्यान सिर्फ अपनी मंजिल पर था, जैसे वहां कोई जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा हो। अचानक, वह एक वीरान, खंडहरनुमा इलाके में मुड़ गई, जहाँ सन्नाटा इतना डरावना था कि विक्रम के दिल की धड़कनें उसके कानों में गूंजने लगीं, और ठीक उसी पल, बिजली की एक जोरदार कड़कड़ाहट ने उस गली के अंतिम छोर पर एक ऐसी परछाई को रोशन किया जिसे देखकर विक्रम के कदम ठिठक गए।

झोपड़ी का रहस्य और एक खौफनाक आवाज़

वह बस्ती, जिसे बस्ती कहना भी शायद उन झुग्गियों की तौहीन होगी, शहर के कचरे के ढेर के पास बसी थी। यहाँ की हवा में सड़ांध थी, और बारिश ने इसे और भी असहनीय बना दिया था। विक्रम ने अपनी नाक पर रूमाल रख लिया, उसका रईस मन उसे वापस लौटने के लिए कह रहा था, लेकिन उसका अहंकार उसे आगे धकेल रहा था। कमला एक टूटी-फूटी झोपड़ी के पास रुकी, जिसकी छत टीन के जंग लगे टुकड़ों और प्लास्टिक की थैलियों से बनी थी। दरवाजा नाम की वहां कोई चीज़ नहीं थी, बस एक टाट का पर्दा हवा में झूल रहा था। विक्रम एक टूटी हुई दीवार की आड़ में छिप गया, उसकी नज़रें उस झोपड़ी पर गड़ी थीं। वह इंतज़ार कर रहा था कि कब कमला उन रोटियों को निकाले और खाए, या शायद अपने शराबी पति को दे, ताकि वह अंदर घुसकर तमाशा बना सके। लेकिन अंदर से आने वाली आवाज़ों ने उसके गुस्से पर ठंडे पानी की बाल्टी उड़ेल दी। अंदर कोई जश्न नहीं मन रहा था, न ही कोई सामान्य बातचीत हो रही थी। वहां से एक अजीब, रोंगटे खड़े कर देने वाली ‘गुर्राहट’ और जंजीरों के बजने की आवाज़ आ रही थी, जैसे किसी जंगली जानवर को कैद करके रखा गया हो। विक्रम ने अपनी सांसें रोक लीं। कमला ने जैसे ही पर्दा हटाया, एक मद्धिम सी लाल रोशनी बाहर आई, और उसने एक दर्दनाक, कांपती हुई आवाज़ में कहा, “शांत हो जा… देख, मैं ले आई हूँ… आज तुझे भूखा नहीं सोना पड़ेगा।” विक्रम की समझ में नहीं आ रहा था कि वह किससे बात कर रही है। क्या उसने कोई कुत्ता पाला है? लेकिन उस आवाज़ में जो दर्द और खौफ मिला हुआ था, वह किसी जानवर के लिए नहीं हो सकता था। जिज्ञासा ने डर को पीछे छोड़ दिया, और विक्रम दबे पांव झोपड़ी के उस फटे हुए हिस्से के करीब गया जहाँ से अंदर का नज़ारा देखा जा सकता था। उसने अपनी आँख उस दरार पर लगाई और जो दृश्य उसकी आँखों के सामने आया, उसने उसके पैरों तले से जमीन ही नहीं खींची, बल्कि उसकी आत्मा को भी कंपा दिया, क्योंकि फर्श पर जंजीरों से बंधा हुआ वह ‘जीव’ कोई जानवर नहीं था, बल्कि कुछ ऐसा था जिसकी कल्पना उसने अपने बुरे से बुरे सपने में भी नहीं की थी।

संदेह की जहरीली आग और मर्सिडीज़ का पीछा

विक्रम सिंघानिया, जिसका नाम ही शहर के सबसे रईस और ताकतवर शख्सियतों में शुमार होता था, आज अपने ही आलीशान महल की चौखट पर खड़ा होकर एक मामूली नौकरानी की हरकतों पर अपनी बाज जैसी नजरें गड़ाए हुए था, उसके मन में संदेह का एक ऐसा तूफ़ान उमड़ रहा था जिसने उसकी वर्षों की समझदारी और तर्कशक्ति को धुंधला कर दिया था। कमला, जो पिछले पांच सालों से उसके घर में बर्तन मांजने और खाना बनाने का काम करती थी, आज जब अपने पुराने और पेबंद लगे थैले को सीने से लगाकर पिछले दरवाजे से बाहर निकली, तो विक्रम की आँखों में वह दो रोटियां किसी हीरे की चोरी से भी बड़ी नजर आ रही थीं, क्योंकि सवाल भूख का नहीं बल्कि उस विश्वासघात का था जो विक्रम को लग रहा था कि उसके साथ किया गया है। वह अपनी भव्य स्टडी की खिड़की से उसे देख रहा था, जहाँ से शहर का नजारा किसी बादशाह की सल्तनत जैसा दिखता था, लेकिन आज उसका ध्यान सिर्फ़ उस झुक कर चलने वाली औरत पर था जो डरी-सहमी सी कदमों को बढ़ाते हुए गेट के बाहर जा रही थी। विक्रम का अहंकार, जिसे उसने अपनी दौलत की ईंटों से खड़ा किया था, उसे यह स्वीकार करने की इजाजत नहीं दे रहा था कि उसके घर से एक भी दाना उसकी मर्जी के बिना बाहर जाए, और इसी सनक ने उसे अपनी चांदी जैसी चमकती मर्सिडीज़ की चाबियाँ उठाने पर मजबूर कर दिया। उसने सोचा था कि शायद कमला इन रोटियों को ले जाकर किसी कबाड़ी को बेचती होगी या शायद उसका कोई शराबी पति होगा जिसे वह यह सब खिलाती है, और यही ‘सच’ जानने की प्यास उसे उस रास्ते पर ले जाने वाली थी जहाँ उसने आज तक अपने कदम तो क्या, अपनी गाड़ी का टायर भी नहीं रखा था। उसने गाड़ी स्टार्ट की, इंजन की मखमली आवाज ने सन्नाटे को तोड़ा, और वह धीरे-धीरे, एक शिकारी की तरह, कमला के पीछे-पीछे अपनी गाड़ी को सड़क पर उतार लाया, लेकिन उसे रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि वह एक चोर को पकड़ने नहीं, बल्कि अपनी ही आत्मा के सबसे काले सच से सामना करने जा रहा है।

शहर का वह बदसूरत चेहरा जिसे अमीरी कभी नहीं देखती

जैसे-जैसे विक्रम की गाड़ी शहर के पॉश इलाके, जहाँ की सड़कें मक्खन की तरह चिकनी थीं और हवा में महंगे इत्र की खुशबू घुली रहती थी, से निकलकर शहर के उस हिस्से की ओर बढ़ी जहाँ का अस्तित्व ही अमीरों के लिए एक धब्बे जैसा था, विक्रम के माथे पर पसीने की बूंदें नहीं, बल्कि लकीरें गहरी होती गईं। एयर कंडीशनर की ठंडी हवा भी बाहर के बदलते हुए माहौल की तपिश को रोकने में नाकाम साबित हो रही थी, क्योंकि शीशे के उस पार की दुनिया तेजी से बदल रही थी; गगनचुंबी इमारतों की जगह अब ईंट-गारे के अधबने मकानों ने ले ली थी, और सड़कों के किनारे लगे सुंदर पाम के पेड़ों की जगह अब कूड़े के ढेर और उन पर मंडराते आवारा जानवरों ने ले ली थी। कमला एक ऑटो में बैठकर जा रही थी और विक्रम को अपनी बड़ी गाड़ी को उन संकरी, ऊबड़-खाबड़ गलियों में चलाने में पसीने छूट रहे थे जहाँ हर इंच जगह के लिए संघर्ष था, जहाँ रिक्शे वालों की गालियां और वाहनों का शोर एक ऐसा संगीत बना रहे थे जो विक्रम के कानों के लिए किसी सजा से कम नहीं था। उसे अपनी गाड़ी की चमक पर धूल जमते देख खीझ हो रही थी, उसका मन बार-बार उसे वापस लौटने को कह रहा था, यह तर्क देते हुए कि दो रोटियों के लिए इतना कष्ट उठाना पागलपन है, लेकिन उसका ज़िद्दी स्वभाव उसे उस गंदगी के दलदल में और गहरे धकेलता जा रहा था। अचानक, कमला का ऑटो एक ऐसी गली के मुहाने पर रुका जहाँ गाड़ी का जाना नामुमकिन था, और विक्रम को न चाहते हुए भी अपनी सुरक्षित धातु की दुनिया से बाहर निकलना पड़ा; जैसे ही उसने अपना इटालियन चमड़े का जूता उस कीचड़-सनी जमीन पर रखा, उसे लगा जैसे उसने किसी दूसरी, वर्जित दुनिया में कदम रख दिया है जहाँ उसका स्वागत एक ऐसी भयानक खामोशी ने किया जो आने वाले तूफ़ान का संकेत दे रही थी।

झुग्गी की तंग गलियों में टिफिन लेकर जाती महिला
झुग्गी की तंग गलियों में टिफिन लेकर जाती महिला

कीचड़, बदबू और रेशमी रूमाल का संघर्ष

विक्रम अब पैदल चल रहा था, और उसका हर कदम संभल-संभल कर पड़ रहा था, मानो वह बारूदी सुरंगों के खेत में चल रहा हो, जबकि उसके चारों ओर का वातावरण उसके अब तक के जीवन के हर अनुभव को चुनौती दे रहा था। यह शहर का वह हिस्सा था जिसे नक़्शे पर भी शायद ही जगह मिलती हो—’काला बस्ती’—जहाँ नालियां खुली बहती थीं और हवा में सड़े हुए खाने, गीली मिट्टी और मानवीय अपशिष्ट की एक ऐसी दमघोंटू गंध रची-बसी थी कि विक्रम को तुरंत अपनी जेब से अपना महँगा रेशमी रूमाल निकालकर अपनी नाक पर दबाना पड़ा। उसकी भृकुटियाँ तन गई थीं, चेहरा घृणा से लाल हो गया था, और वह अपनी सांसों को रोक-रोक कर ले रहा था ताकि उस जहरीली हवा का कम से कम हिस्सा उसके फेफड़ों तक पहुँचे, जबकि आस-पास खेलते नंगे बदन बच्चे और मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटे लोग उसे ऐसे देख रहे थे जैसे कोई एलियन उनके ग्रह पर उतर आया हो। कमला, जो अब उससे कुछ पचास मीटर आगे थी, इन गलियों में ऐसे चल रही थी जैसे उसे रास्ते की गंदगी का कोई आभास ही न हो; वह उन गंदे पानी के गड्ढों को ऐसे लांघ रही थी जैसे वह रोज का काम हो, और विक्रम को उसे नज़रों से ओझल न होने देने के लिए अपनी सारी इच्छाशक्ति जुटानी पड़ रही थी। उसे अपनी महंगी सूट पर उड़ती हुई मक्खियों से घिन आ रही थी, उसे उस हर चीज़ से नफरत हो रही थी जो उसके संपर्क में आ रही थी, और उसके मन में कमला के लिए गुस्सा और बढ़ गया कि वह ऐसी नारकीय जगह पर रहती है और फिर उसके साफ़-सुथरे घर में काम करने आती है। वह लगभग पलटने ही वाला था, अपनी जासूसी को वहीं ख़त्म करके भाग जाने वाला था, तभी उसने देखा कि कमला एक बेहद जर्जर, टीन की छत वाली झोपड़ी के सामने रुकी, जिसके दरवाजे पर एक अजीब सा, डरावना अंधेरा पसरा हुआ था जो विक्रम को अपनी ओर खींच रहा था।

टूटी चौखट के पीछे छिपा खौफनाक मंजर

विक्रम एक टूटी हुई दीवार की आड़ में छिप गया, उसका दिल अब उसकी पसलियों से बाहर आने को बेताब था, न सिर्फ़ उस दौड़-भाग की वजह से, बल्कि उस अज्ञात रहस्य के डर से जो अब खुलने वाला था। जिस झोपड़ी में कमला दाखिल हुई थी, वह किसी इंसानी रिहाइश से ज़्यादा जानवरों के बाड़े जैसी लग रही थी; दीवारें सीलन से काली पड़ चुकी थीं और छत में इतने छेद थे कि बारिश का पानी और धूप बिना रोक-टोक के अंदर आते होंगे। विक्रम ने अपनी नाक से रूमाल हटाया नहीं, लेकिन उसकी आँखें उस झोपड़ी के अंधेरे में कुछ टटोलने की कोशिश कर रही थीं, जहाँ से अब कमला की सिसकियों की हल्की आवाज़ें आ रही थीं, जो बाहर के शोरगुल में भी विक्रम के कानों तक किसी तीर की तरह पहुँचीं। उसने सोचा था कि वह कमला को रंगे हाथों पकड़ेगा, उसे रोटियाँ खाते हुए या बेचते हुए देखेगा और फिर उसे अपनी नौकरी से निकालने का फरमान सुनाकर अपनी जीत का जश्न मनाएगा, लेकिन वहां का सन्नाटा कुछ और ही कहानी कह रहा था। विक्रम ने हिम्मत जुटाई और दबे पांव उस झोपड़ी के उस हिस्से की तरफ बढ़ा जहाँ से अंदर का नज़ारा देखा जा सकता था, एक छोटी सी दरार, जो उस गरीब की दुनिया में झांकने का उसका झरोखा बन गई। जैसे ही उसने अपनी आँख उस दरार पर लगाई, अंदर मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में जो दृश्य उसकी आँखों के सामने आया, उसने उसके पैरों तले से सिर्फ़ ज़मीन ही नहीं खिसकाई, बल्कि उसके पूरे वजूद को झकझोर कर रख दिया; विक्रम की साँसें उसके गले में ही अटक गईं और वह चाहकर भी अपनी पलकें झपका नहीं पाया क्योंकि वह एक ऐसी सच्चाई से रूबरू हुआ था जिसके लिए उसकी दौलत ने उसे कभी तैयार ही नहीं किया था।

1. अमीरजादे के वो क़दम जो नरक के द्वार तक आ पहुँचे

शहर की चकाचौंध और वातानुकूलित कारों की दुनिया को पीछे छोड़ते हुए, विक्रम आज एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहा था जिसका अस्तित्व उसे अब तक केवल कहानियों में ही पता था, जहाँ हवा में ऑक्सीजन कम और नालियों की सड़ांध ज्यादा थी। विक्रम की आँखों में गुस्से की एक ऐसी परत चढ़ी हुई थी जिसने उसे अंधा कर दिया था; उसे सिर्फ़ वो दो रोटियां दिख रही थीं जो उसकी रसोइया कमला ने उसकी नज़रों से बचाकर, किसी शातिर चोर की भांति अपने पल्लू में छिपाई थीं। उसका अहंकारी मन बार-बार यही दोहरा रहा था कि आज इस औरत को रंगे हाथों पकड़कर पुलिस के हवाले करना है, क्योंकि सवाल दो रोटियों का नहीं, बल्कि ‘विश्वासघात’ का था। जैसे-जैसे वह कमला का पीछा करते हुए उस तंग, कीचड़ से सनी बस्ती की संकरी गलियों में आगे बढ़ा, उसके महंगे जूतों पर लगती गंदगी उसे और भी ज्यादा क्रोधित कर रही थी। यहाँ का वातावरण इतना भारी और दमघोंटू था कि सांस लेना भी दूभर हो रहा था, हर तरफ गरीबी का नंगा नाच और मायूसी के साये थे, लेकिन विक्रम का ध्यान सिर्फ़ उस मटमैले रंग की साड़ी पर टिका था जो उससे कुछ ही गज की दूरी पर, अंधेरे में एक भूतिया परछाई की तरह आगे बढ़ रही थी। वह सोच रहा था कि कमला घर जाकर उन रोटियों को अपने शराबी पति या आवारा बेटों के साथ मिलकर खाएगी और उसकी दौलत का मज़ाक उड़ाएगी, यही सोच उसके खून को खौला रही थी और उसे वापस मुड़ने नहीं दे रही थी। वह एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ जहाँ रौशनी पूरी तरह दम तोड़ चुकी थी, और सामने खड़ी झोपड़ियां किसी कब्रगाह के पत्थरों जैसी प्रतीत हो रही थीं, जहाँ से जीवन की उम्मीद कब की रुखसत हो चुकी थी। तभी कमला एक जर्जर, टूटी-फूटी झोपड़ी के भीतर दाखिल हुई, जिसका दरवाज़ा केवल नाममात्र का था, और जैसे ही वह भीतर ओझल हुई, विक्रम ने एक दबी हुई, रहस्यमयी आवाज़ सुनी जिसने उसके कदमों को वहीं पत्थर का बना दिया—एक ऐसी कराह जो इंसान की कम और किसी घायल जानवर की ज्यादा लग रही थी।

2. दीवार की दरार से दिखी वो दुनिया जिसने विक्रम का अहंकार तोड़ दिया

विक्रम दबे पांव उस झोपड़ी की दीवार के करीब पहुँचा, जो शायद मिट्टी और प्लास्टिक की थैलियों के सहारे खड़ी थी, और उसका दिल किसी हथौड़े की तरह उसकी पसलियों से टकरा रहा था, न कि डर से, बल्कि उस ‘चोरी’ को पकड़ने के उन्माद से जो उसके दिमाग पर हावी था। झोपड़ी के भीतर घुप अंधेरा था, केवल एक टिमटिमाता हुआ दिया अपनी आखिरी सांसें ले रहा था, जिसकी पीली और कमजोर रौशनी दीवारों पर डरावनी परछाइयां बना रही थी। विक्रम ने अपनी एक आँख दीवार में मौजूद एक चौड़ी दरार पर टिका दी, जहाँ से उसे भीतर का पूरा दृश्य दिखाई दे रहा था, और वह अपनी सांसें रोककर उस पल का इंतज़ार करने लगा जब कमला बैठकर उन रोटियों को खाएगी। भीतर की बदबू बाहर की हवा से भी ज्यादा तेज थी, जैसे वहाँ बीमारी और लाचारी ने अपना स्थायी घर बना लिया हो। उसने देखा कि कमला ने अपना पल्लू खोला और उसमें लिपटी हुई उन दो जली, सूखी और बेस्वाद रोटियों को एक पुराने, जंग लगे एल्युमीनियम की प्लेट में ऐसे रखा जैसे वह दुनिया का सबसे बेशकीमती खज़ाना हो। विक्रम के मन में तिरस्कार का भाव आया कि इन बासी टुकड़ों के लिए इस औरत ने अपनी ईमानदारी बेच दी, लेकिन तभी कमला ने पास रखे एक मटके से पानी लिया और उन रोटियों को गीला करना शुरू किया ताकि वे थोड़ी नरम हो सकें। विक्रम की भौहें तन गईं, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसा क्यों कर रही है, क्या वह खुद खाने के लिए इतना प्रपंच कर रही है? लेकिन तभी कमरे के सबसे अंधेरे कोने में पड़ी एक खाट पर कुछ हलचल हुई, कपड़ों के ढेर जैसा दिखने वाला वह वजूद हिला, और विक्रम की रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन दौड़ गई क्योंकि उसे आभास हुआ कि वह कोई सामान्य इंसान नहीं, बल्कि हाड़-मांस का एक ऐसा ढांचा था जो शायद वर्षों से उस बिस्तर से उठा ही नहीं था।

3.

गरीब बच्चे को अपने हाथों से खाना खिलाती नौकरानी
गरीब बच्चे को अपने हाथों से खाना खिलाती नौकरानी

वो निवाला जो किसी और के हलक का सहारा बना

विक्रम की आँखें फटी की फटी रह गईं जब उसने

गरीब बच्चे को अपने हाथों से खाना खिलाती नौकरानी
गरीब बच्चे को अपने हाथों से खाना खिलाती नौकरानी

देखा कि कमला उन भीगी हुई रोटियों का लुगदी जैसा टुकड़ा बनाकर खुद नहीं खा रही थी, बल्कि उस बिस्तर पर पड़े एक अर्द्ध-विकसित, लकवाग्रस्त और कंकाल जैसे दिखते हुए लड़के के मुँह में डाल रही थी। वह लड़का, जो शायद उसका बेटा था, न बोल सकता था, न हिल सकता था, बस उसकी बड़ी-बड़ी पथराई आँखों में भूख की तड़प साफ दिख रही थी। कमला उसे एक छोटे बच्चे की तरह पुचकार रही थी, “खा ले मेरे लाल, आज मालिक के घर से बहुत अच्छा खाना लाई हूँ,” जबकि असलियत में वह रोटियां जली हुई थीं और विक्रम के घर के कुत्ते भी शायद उन्हें सूंघकर छोड़ देते। कमला के चेहरे पर उस वक़्त एक ऐसी ममता और संतोष था जिसे शब्दों में पिरोना असंभव था; वह हर एक निवाला उसे खिला रही थी और बीच-बीच में अपनी साड़ी के पल्लू से उसके मुँह से गिरती लार को पोंछ रही थी। विक्रम ने महसूस किया कि कमला ने सुबह से खुद कुछ नहीं खाया था, उसका अपना पेट पीठ से लगा हुआ था, उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन फिर भी वह उन दो रोटियों का एक भी टुकड़ा अपने मुँह में डालने की बजाय उस बेजान शरीर को जीवित रखने की जद्दोजहद में लगी हुई थी। यह दृश्य किसी भी पत्थर दिल इंसान को पिघलाने के लिए काफी था, क्योंकि यहाँ एक माँ अपनी भूख को मारकर, अपनी आत्मा को गिरवी रखकर, अपने बच्चे की सांसों का सौदा कर रही थी। विक्रम को अपनी साँसें अटकती हुई महसूस हुईं, उसे लगा जैसे किसी ने उसका गला घोंट दिया हो, क्योंकि वह उस ‘चोर’ को पकड़ने आया था जो असल में एक ‘देवी’ की तरह त्याग कर रही थी। और फिर, वह हुआ जिसकी कल्पना ने विक्रम की रूह को झकझोर कर रख दिया—लड़के के खाना खाने के बाद, कमला ने उस खाली प्लेट में बचे हुए पानी को ही पी लिया और अपनी भूख को उसी पानी से शांत करने की कोशिश की, और फिर आसमान की तरफ देखकर हाथ जोड़े जैसे वह भगवान का शुक्रिया अदा कर रही हो।

4. करोड़पति की गरीबी और नौकरानी की अमीरी का वो खौफनाक सच

उस क्षण, उस टूटी हुई दीवार के पीछे खड़े विक्रम को लगा जैसे उसके पैरों तले से पूरी धरती खिसक गई हो और वह एक गहरे, अंधेरे रसातल में गिरता जा रहा हो। जिस “करोड़पति” होने का उसे गुमान था, वह गुमान उस झोपड़ी की धूल में मिल चुका था; उसे अपनी करोड़ों की दौलत, अपनी गाड़ियाँ, और अपना बंगला उस दो रोटी के त्याग के सामने रद्दी के टुकड़ों से भी सस्ता लगने लगा। उसका जमीर उसे धिक्कार रहा था, उसे अपनी उस सोच पर घिन आ रही थी जिसने कमला की मजबूरी को चोरी का नाम दे दिया था। उसकी आँखों से अनचाहे आँसू बह निकले, जो उसके गालों पर नहीं, बल्कि उसकी आत्मा पर गिर रहे थे, क्योंकि उसने आज इंसानियत का सबसे वीभत्स और सबसे पवित्र रूप एक साथ देख लिया था। वह वहाँ खड़ा रहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, उसका शरीर शर्मिंदगी के बोझ से इतना भारी हो गया था कि एक कदम उठाना भी पहाड़ चढ़ने जैसा लग रहा था। वह समझ गया था कि कमला ने रोटियां अपनी भूख के लिए नहीं चुराई थीं, बल्कि उस जान को बचाने के लिए चुराई थीं जो उसके बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकती थी। विक्रम को याद आया कि कैसे उसने कमला को उन रोटियों के लिए डांटा था, और वह चुपचाप सर झुकाकर सब सुनती रही, क्योंकि उसके लिए अपनी बेइज्जती से ज्यादा जरूरी अपने बेटे का पेट भरना था। हवा का हर झोंका अब विक्रम के कानों में एक ही सवाल दाग रहा था: “असली गरीब कौन है? वह जो रोटियां मांग रहा है, या वह जो रोटियां होकर भी किसी का पेट नहीं भर सका?” और इसी आत्मग्लानि के तूफ़ान के बीच, विक्रम ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने आने वाले कल को हमेशा के लिए बदलने की नींव रख दी, लेकिन क्या अब बहुत देर हो चुकी थी?

खंडहर में गूंजती सिसकियाँ और एक अमीर का फना होता गुरूर

विक्रम की आलीशान गाड़ी उस तंग, बदबूदार गली के मुहाने पर खड़ी थी, जहाँ की हवा में ही गरीबी और बेबसी का शोर गूँजता था, और उसके महंगे जूतों पर लगी कीचड़ उसे बार-बार यह याद दिला रही थी कि वह अपनी मखमली दुनिया से कितनी दूर आ गया है। जिस गुस्से और शक की आग में जलता हुआ वह अपनी नौकरानी कमला का पीछा करते हुए यहाँ तक आया था, वह आग अब उस दृश्य को देखकर बर्फ की तरह ठंडी पड़ चुकी थी जिसने उसके अस्तित्व को ही झकझोर कर रख दिया था; सामने एक टूटी-फूटी झोपड़ी के बाहर, टिमटिमाते हुए दिए की मद्धम रोशनी में कमला बैठी थी, और जिन दो रोटियों के लिए विक्रम ने उसे चोर समझा था, जिन दो रोटियों के लिए उसने उसे जलील करने की योजना बनाई थी, वे रोटियाँ वह खुद नहीं खा रही थी, बल्कि एक मरणासन्न, लावारिस बूढ़ी औरत और एक कांपते हुए कुत्ते को अपने हाथों से खिला रही थी। यह दृश्य विक्रम के दिल पर किसी हथौड़े की तरह लगा, क्योंकि वह देख सकता था कि कमला का खुद का पेट भूख से अंदर धंसा हुआ था, उसके होंठ प्यास से सूखे थे, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—त्याग की चमक, जो विक्रम की अरबों की दौलत में भी कभी नहीं थी। विक्रम को अचानक अपने करोड़ों के साम्राज्य, अपने बड़े विला और अपनी उस छोटी सी मानसिकता पर इतना घिनौना महसूस हुआ कि उसे लगा जैसे वह अभी, इसी वक्त, जमीन में गड़ जाए; उसका अहंकार, जो उसे लगता था कि हिमालय से भी ऊंचा है, इस गरीब बस्ती की धूल में मिल चुका था। बारिश की बूंदें अब तेज हो गई थीं, जो शायद विक्रम के अंदर उठ रहे तूफ़ान का साथ दे रही थीं, और जैसे ही उसने आगे बढ़ने की कोशिश की, उसके पैरों ने जवाब दे दिया, जैसे कि कुदरत उसे सजा देने के लिए वहीं जड़ कर देना चाहती हो, लेकिन तभी कमला की नजर उस पर पड़ी और उसकी आँखों में उभरा हुआ खौफ विक्रम की रूह को चीरता हुआ निकल गया।

पश्चाताप की अग्नि और कांपते हाथ

कमला ने जैसे ही अपने मालिक को उस अंधेरे में सूट-बूट में खड़ा देखा, उसके हाथ से रोटी का टुकड़ा छूटकर गिर गया और उसका चेहरा भय से पीला पड़ गया, मानो उसे लगा हो कि अब उसे चोरी की सजा मिलेगी, उसे जेल भेज दिया जाएगा, या उसकी नौकरी चली जाएगी जो उसके परिवार का एकमात्र सहारा थी। उस बेचारी औरत का यह डर विक्रम के लिए किसी तेजाब से कम नहीं था; उसने महसूस किया कि वह उस औरत की नजर में एक रक्षक नहीं, बल्कि एक राक्षस है, एक ऐसा इंसान जो अपनी दौलत के नशे में यह भूल गया कि भूख का रंग कैसा होता है। विक्रम का गला रुंध गया, वह कुछ बोलना चाहता था, चीखकर कहना चाहता था कि “मैं गलत था,” लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक कर दम तोड़ने लगे। उसके दिमाग में वे सारे पल किसी फिल्म की रील की तरह घूमने लगे जब उसने खाने की मेज पर खाना छोड़ दिया था, जब उसने बासी रोटियों को कूड़ेदान में फेंकने का हुक्म दिया था, और आज वही रोटियाँ यहाँ किसी की जान बचा रही थीं। वह भारी कदमों से, लड़खड़ाते हुए कमला की ओर बढ़ा, उसका सर शर्म से इतना झुक गया था कि उसे उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी; उसके महंगे कपड़े अब उसे काट रहे थे, उसकी घड़ी की टिक-टिक उसे अपने समय की बर्बादी का एहसास दिला रही थी। उसने देखा कि कमला थर-थर कांप रही है, उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए थे जैसे वह रहम की भीख मांग रही हो, और यह दृश्य विक्रम के बचे-खुचे गुरूर को भी राख कर देने के लिए काफी था। वह उस कीचड़ भरी जमीन पर, जहाँ शायद उसने कभी पैर रखने का भी नहीं सोचा होगा, घुटनों के बल गिर पड़ा, और उसकी आँखों से आंसुओं का ऐसा सैलाब फूटा जिसने बरसों से जमी उसकी कठोरता की परत को एक ही झटके में बहा दिया, और फिर माहौल में एक ऐसी खामोशी छा गई जो किसी आने वाले तूफ़ान का संकेत दे रही थी।

आंसुओं का सैलाब और मानवता का पुनर्जन्म

पछतावे में रोता हुआ सूट-बूट पहना करोड़पति
पछतावे में रोता हुआ सूट-बूट पहना करोड़पति

विक्रम, जो कभी किसी के सामने सर नहीं झुकाता था, आज एक नौकरानी के पैरों के पास बैठकर बच्चों की तरह बिलख-बिलख कर रो रहा था, उसकी सिसकियाँ उस वीरान बस्ती के सन्नाटे को चीर रही थीं। “मुझे माफ़ कर दो कमला, मुझे माफ़ कर दो!” उसकी आवाज़ फटी हुई और दर्द से भरी थी, “मैं अंधा था, मेरी दौलत ने मुझे अंधा कर दिया था, मैंने दो रोटियों के लिए तुम्हारी ईमानदारी पर शक किया, जबकि तुम्हारा दिल मेरी पूरी जायदाद से भी बड़ा है।” कमला हतप्रभ थी, उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उसका करोड़पति मालिक, जो हमेशा कड़क आवाज़ में बात करता था, आज उसके सामने हाथ जोड़कर, आंसुओं में भीगा हुआ, माफी मांग रहा है। विक्रम ने अपने कांपते हुए हाथों से अपनी जेब से अपना बटुआ निकाला, उसमें जितने भी नोट थे, सब निकालकर उस बूढ़ी औरत के पास रख दिए, लेकिन उसे तुरंत एहसास हुआ कि यह कागज के टुकड़े उस पाप का प्रायश्चित नहीं कर सकते जो उसने अपनी सोच में किया था। उसने कमला के जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में ले लिया—वे हाथ जो बर्तन मांजते-मांजते खुरदरे हो गए थे, लेकिन विक्रम को वे हाथ आज दुनिया की सबसे पवित्र चीज़ लग रहे थे। उसने कसम खाई, “आज के बाद तुम कभी भूखी नहीं रहोगी, यह मेरा वादा है, और मैं… मैं कोशिश करूँगा कि मैं इंसान बन सकूँ।” उस पल, बारिश का पानी और विक्रम के आंसू मिलकर एक हो गए थे, और उसने महसूस किया कि उसका दिल, जो अब तक सिर्फ पत्थर का एक टुकड़ा था, पिघलकर फिर से धड़कने लगा है। लेकिन क्या यह पश्चाताप काफी था? क्या महज माफ़ी मांग लेने से वह घाव भर सकता था जो उसने अनजाने में उस गरीब की आत्मा पर लगाया था? विक्रम ने सर उठाकर कमला की ओर देखा, और उसकी आँखों में उसे माफ़ी तो दिखी, लेकिन साथ ही एक ऐसा सवाल भी दिखा जो उसे जीवन भर सोने नहीं देगा।

एक अधूरी जीत और कभी न मिटने वाला निशान

वापसी का सफर विक्रम की ज़िन्दगी का सबसे लंबा सफर था; उसकी आलीशान कार अब उसे एक पिंजरे जैसी लग रही थी, और बाहर की दुनिया, जिसे वह हिकारत से देखता था, अब उसे आईना दिखा रही थी। उसने कमला की तनख्वाह बढ़ा दी थी, उस बूढ़ी औरत के इलाज का इंतज़ाम कर दिया था, और घर के सारे नौकरों को इज़्ज़त देने का फरमान जारी कर दिया था, लेकिन उसके सीने में एक भारीपन था जो जाने का नाम नहीं ले रहा था। जब वह अपने घर की डाइनिंग टेबल पर बैठा, जहाँ तरह-तरह के पकवान सजे थे, तो उसे उन दो रोटियों की याद आई; उसे लगा कि यह सारा खाना बेस्वाद है अगर इसे किसी जरूरतमंद के साथ न बांटा जाए। विक्रम समझ चुका था कि असली गरीबी पैसों की कमी नहीं, बल्कि संवेदनाओं की कमी होती है, और वह आज तक दुनिया का सबसे गरीब इंसान था। उस रात, रेशमी बिस्तरों पर लेटे हुए भी उसे नींद नहीं आई, क्योंकि उसकी बंद आँखों के सामने बार-बार कमला का वह चेहरा आ रहा था—भूखा, प्यासा, लेकिन संतोष से भरा हुआ। उसने दीवार पर टंगी अपनी करोड़ों की पेंटिंग को देखा और उसे वह फीकी लगी, क्योंकि उसने आज इंसानियत का सबसे खूबसूरत रंग उस गंदी बस्ती में देखा था। कहानी का अंत तो हो गया था, विक्रम बदल गया था, लेकिन उसके दिल के किसी कोने में एक कसक हमेशा के लिए रह गई—यह एहसास कि उसने सचाई जानने में बहुत देर कर दी, और यह कि कभी-कभी दो रोटियों की कीमत, करोड़ों के साम्राज्य से भी ज्यादा होती है, और जैसे ही उसने खिड़की से बाहर झाँका, उसे ऐसा लगा जैसे चाँद भी उसे घूर रहा हो, पूछ रहा हो कि क्या वाकई वह माफ़ी का हक़दार था? {
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