अतीत के वो सुनहरे झूठ और तूफानी रात का गहराता साया
वह रात आज भी मेरी यादों में किसी पुराने, खौफनाक चलचित्र की तरह चलती है, जब आसमान का सीना चीरकर गिरती हुई बारिश की बूंदें खिड़कियों के शीशों पर किसी अदृश्य दुश्मन की तरह दस्तक दे रही थीं, और उस पुराने, लकड़ी के फर्नीचर से सजे हुए दफ्तर में सिर्फ एक ही आवाज गूंज रही थी—घड़ी की टिक-टिक, जो मेरे दिल की धड़कनों के साथ एक अजीब सी होड़ लगा रही थी। एक साल पहले की वह शाम, जिसे मैं अपनी जिंदगी का सबसे अहम मोड़ समझ रहा था, दरअसल वह एक ऐसी दलदल का पहला कदम थी जहाँ सिर्फ उम्मीदों की लाशें और भरोसे का खून बिखरा पड़ा था; कमरे के अंदर की हवा में एक अजीब सी भारी महक थी, शायद पुराने कागजों और उस महंगी सिगार की, जिसे मेरे सामने बैठा वह शख्स—जिसे मैं अपना मसीहा मान बैठा था—बड़े इत्मीनान से पी रहा था, उसके चेहरे पर एक ऐसी सुकून देने वाली मुस्कान थी जो किसी भूखे शेर की तरह शांत और घातक थी। मैंने अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी, अपने बच्चों के भविष्य के लिए जोड़ा गया एक-एक रुपया, और अपने बुजुर्ग पिता की पेंशन का वो हिस्सा जिसे हमने बुरे वक्त के लिए बचा रखा था, सब कुछ समेट कर उस भूरे रंग के चमड़े के बैग में भर दिया था, और मेरे हाथ कांप रहे थे, न जाने वो ठंड की वजह से था या फिर उस अनजाने डर की वजह से जो मेरे अवचेतन मन में कहीं न कहीं मुझे चेतावनी दे रहा था कि मैं एक बहुत बड़ी गलती करने जा रहा हूँ। उसने मेरी आँखों में देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे उसे पहले से पता हो कि शिकार अब जाल में पूरी तरह फंस चुका है, और उसने अपनी मखमली आवाज में कहा था, “चिंता मत करो, यह पैसा सिर्फ एक निवेश नहीं, बल्कि तुम्हारे खानदान की तकदीर बदलने वाली चाबी है,” और मैंने मूर्खों की तरह उस झूठ को सच मान लिया, क्योंकि इंसान जब मजबूरी और लालच के दोराहे पर खड़ा होता है, तो उसे तर्क से ज्यादा चमत्कार पर भरोसा होने लगता है। बाहर बादलों की गर्जना ने मेरे कानों को सुन्न कर दिया था, शायद कुदरत मुझे रोकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मैंने उस चेतावनी को अनसुना कर दिया और कांपते हाथों से उस बैग को मेज के उस पार सरका दिया, यह जाने बिना कि उस पल, उस एक सेकंड में, मैंने अपनी शांति, अपनी नींद और अपने परिवार की खुशियों का सौदा कर लिया था।
विश्वास का सौदागर और सपनों का वो कांच का महल
हमारे बीच का रिश्ता कोई एक या दो दिन का नहीं था, बल्कि दशकों पुराना था, एक ऐसा रिश्ता जो खून के रिश्तों से भी ज्यादा गहरा और मजबूत नजर आता था, जहाँ हर सुख और दुख में हमने एक-दूसरे का साथ दिया था, और शायद यही वो सबसे बड़ा कारण था कि जब उसने उस “सुनहरे अवसर” का जिक्र किया, तो मेरे मन में सवाल उठाने की हिम्मत ही नहीं हुई। वह मुझे समझा रहा था कि कैसे यह योजना रातों-रात हमें उस मुकाम पर पहुँचा देगी जहाँ तक पहुँचने के लिए लोग पूरी जिंदगी घिसटते रहते हैं; उसके शब्दों में ऐसा जादू था, ऐसा सम्मोहन था कि मुझे अपनी आंखों के सामने वो आलिशान घर, अपनी बेटी की भव्य शादी, और एक चिंतामुक्त बुढ़ापा साफ-साफ दिखाई देने लगा था, जैसे कि वो सब बस एक हाथ की दूरी पर हों। उसने मेज पर रखे उन रंगीन कागजों और नक्शों की तरफ इशारा किया,
बूढ़े हाथों में खाली बैंक पासबुक का क्लोज़-अप शॉट।
, जिनमें बड़े-बड़े आकड़े और मुनाफे के ग्राफ बने हुए थे, जो किसी भी समझदार इंसान को लुभाने के लिए काफी थे, और वह लगातार बोले जा रहा था कि कैसे बाजार का रुख बदल रहा है और अगर आज हमने यह मौका गंवा दिया, तो हम पूरी जिंदगी सिर्फ पछताते रह जाएंगे। मैं उसकी बातों में इतना खो गया था कि मैंने यह गौर ही नहीं किया कि उसकी हँसी आँखों तक नहीं पहुँच रही थी, उसके माथे पर पसीने की वो बारीक लकीरें जो उस वातानुकूलित कमरे में भी चमक रही थीं, शायद उसके अंदर चल रहे किसी द्वंद्व या फिर उस डर की निशानी थीं कि कहीं उसका झूठ पकड़ा न जाए। लेकिन भरोसा एक ऐसी पट्टी है जो इंसान की आँखों पर बंध जाए तो उसे खाई भी समतल मैदान नजर आती है; मैंने उन सभी तर्कों को, उन सभी शंकाओं को अपने मन के किसी कोने में दफन कर दिया जो चीख-चीख कर कह रही थीं कि इतना ज्यादा मुनाफा मुमकिन नहीं है, क्योंकि उस वक्त मुझे पैसे की खनक ने बहरा कर दिया था। हम दोनों ने उस रात जिस समझौते पर हाथ मिलाया, वह सिर्फ एक व्यापारिक सौदा नहीं था, बल्कि मेरे वजूद का एक हिस्सा था जिसे मैंने गिरवी रख दिया था, और अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे उस पल की भयावहता का अहसास होता है जब उसने कहा था, “अगले साल इसी तारीख को हम जश्न मनाएंगे,” और मैंने नहीं सोचा था कि वह जश्न नहीं, बल्कि मातम की शुरुआत होगी।
आखिरी दस्तखत: जब सन्नाटे ने हमेशा के लिए अपना घर बना लिया
अंत में वह घड़ी आ ही गई जब मुझे उस दस्तावेज पर अपने हस्ताक्षर करने थे, कागज का वह टुकड़ा जो कानूनी तौर पर मुझे सुरक्षित महसूस करा रहा था लेकिन असलियत में वह मेरी बर्बादी का परवाना था; पेन की नोक जैसे ही कागज पर चली, मुझे लगा जैसे मैंने अपनी रूह का एक हिस्सा काटकर उसे दे दिया हो। कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था, बाहर तूफान और तेज हो गया था, खिड़कियां खड़खड़ा रही थीं जैसे वे उस कमरे में कैद किसी बुरी आत्मा को बाहर निकलने का रास्ता दे रही हों, और जैसे ही मैंने अपना नाम पूरा लिखा, उसने तुरंत कागज अपनी तरफ खींच लिया, जैसे कोई भूखा गिद्ध अपने शिकार पर झपटता है। उसकी आँखों में एक पल के लिए वह क्रूर संतोष दिखाई दिया जो जीत के बाद किसी शातिर खिलाड़ी के चेहरे पर आता है, लेकिन अगले ही पल उसने अपना नकाब फिर से ओढ़ लिया और मुझे गले लगाकर बधाई दी, उसके स्पर्श में वह गर्माहट नहीं थी जो पहले हुआ करती थी, बल्कि एक अजीब सी सिहरन थी जिसने मेरी रीढ़ की हड्डी में कंपन पैदा कर दी। मैंने उस बैग की तरफ आखिरी बार देखा जिसमें मेरी मेहनत की कमाई थी, अब वह बैग उसका हो चुका था, और बदले में मेरे पास था तो सिर्फ एक वादे का खोखला कागज और ढेर सारे सुनहरे सपने जो कांच की तरह नाजुक थे। जब मैं उस दफ्तर से बाहर निकला, तो बारिश मेरे आंसुओं को छुपाने के लिए तैयार खड़ी थी, हालांकि तब मैं रो नहीं रहा था, मैं तो खुशी से झूम रहा था, यह सोचते हुए कि मैंने दुनिया जीत ली है, लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस दरवाजे को मैं अपने पीछे बंद करके आया हूँ, उसके पीछे बैठा वो शख्स अब एक ऐसी योजना को अंजाम देने वाला है जो मेरे पैरों तले की जमीन खिसका देगी। मैं अपनी गाड़ी में बैठा और पीछे मुड़कर उस इमारत की तरफ देखा, जहाँ एक ही खिड़की में रोशनी जल रही थी, और ठीक उसी वक्त वह रोशनी बुझ गई, और उस अंधेरे के साथ ही मेरा वह सुनहरा सपना भी हमेशा के लिए विलीन हो गया, क्योंकि वह आखिरी बार था जब मैंने उसे, उस दफ्तर को, या अपने उन पैसों को देखा था; अब सवाल यह नहीं है कि पैसा कहाँ गया, सवाल यह है कि उस रात के बाद जो सन्नाटा छाया, वह इतना जानलेवा क्यों है?
तारीखों का मकड़जाल: उम्मीद और हताशा के बीच झूलती वो पहली छमाही
उस पुराने, सीलन भरे कमरे की दीवार पर टंगा हुआ वह कैलेंडर अब महज तारीखें दिखाने वाला कागज़ का टुकड़ा नहीं रह गया था, बल्कि वह एक जल्लाद की तरह हर रोज़ रामदीन के सीने पर आरी चला रहा था, जिसमें हर बदलती तारीख उसकी बेचैनी को और गहरा, और भयावह करती जा रही थी। शुरुआत के तीन महीने तो किसी सुनहरे स्वप्न की तरह बीते थे, जहाँ एजेंट सुमित की चिकनी-चुपड़ी बातों और “डबल रिटर्न” के वादे ने रामदीन की आँखों पर एक ऐसा पर्दा डाल दिया था कि उसे अपनी फटी बनियान और घिस चुकी चप्पलों में भी एक आने वाली रईसी की महक आती थी, मगर जैसे-जैसे वसंत की बहार, जेठ की तपती दोपहरी में बदली, वैसे-वैसे रामदीन के माथे पर चिंता की लकीरें किसी गहरे जख्म की तरह उभरने लगीं। उसकी सरकारी नौकरी से मिलने वाली वह मामूली सी पेंशन, जो बमुश्किल घर के राशन और बिजली के बिल का बोझ उठा पाती थी, अब किसी सूखते हुए कुएं की तरह प्रतीत होने लगी थी, क्योंकि उसने अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी, ग्रेच्युटी का एक-एक पैसा, और यहाँ तक कि अपनी पत्नी के इलाज के लिए रखे गए आपातकालीन फंड को भी उस “जादुई स्कीम” के हवाले कर दिया था। हर महीने की पहली तारीख को वह पासबुक लेकर बैंक की लाइन में इस उम्मीद के साथ खड़ा होता कि शायद आज वह बड़ा मैसेज आएगा, शायद आज उसके खाते में वो promised (वादित) रकम झलकेगी, लेकिन हर बार क्लर्क की नीरस और थकी हुई आवाज़ में “बैलेंस वही है बाबा” सुनकर उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक जाती। घर लौटते वक्त, बाज़ार की रंगीनियों को नज़रों से ओझल करते हुए, वह अपनी पत्नी सावित्री की उम्मीद भरी बूढ़ी आँखों का सामना करने से कतराता था, जो हर शाम दरवाजे की चौखट पर बैठकर इस इंतज़ार में रहती थी कि उसका पति आज शायद वो खबर लाएगा जिससे उनकी तंगहाली हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। सन्नाटा अब घर के कोने-कोने में पसर चुका था, न तो अब शाम की चाय पर कोई हंसी-मजाक होता था और न ही पुराने रेडियो पर गाने बजते थे, बस बच गई थी तो वह जानलेवा ख़ामोशी जो हर गुज़रते पल के साथ यह चीख-चीख कर कह रही थी कि कुछ तो बहुत गलत हो रहा है, और रामदीन अपने दिल को झूठी तसल्लियां देते-देते अब अंदर से खोखला हो चुका था, मगर उसे क्या पता था कि यह तो बस उस तूफान की आहट थी जो उसकी बची-खुची दुनिया को उजाड़ने के लिए अभी तैयार हो रहा था। तभी, एक उमस भरी रात में, जब बिजली कटी हुई थी और मच्छरों की भिनभिनाहट के बीच रामदीन करवटें बदल रहा था, उसके फोन की स्क्रीन एक अनजान नंबर से जगमगा उठी, और उस आधी रात को आए उस फोन कॉल ने उसकी धड़कनों को एक ऐसी रफ़्तार दी जो सामान्य नहीं थी।
सिसकती जरूरतें और बंद दरवाजों का सन्नाटा
खिड़की के पास बारिश को देखता हुआ उदास बुजुर्ग व्यक्ति।
जैसे ही बरसात का मौसम आया, घर की छत से टपकने वाली हर एक बूंद रामदीन के सब्र के बांध को तोड़ने लगी, क्योंकि जिस पैसे से छत की मरम्मत होनी थी, वह पैसा तो एक साल बाद दोगुना होकर मिलने वाले लालच की भट्ठी में झोंक दिया गया था, और अब हालात यह थे कि घर के बर्तनों को बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए फर्श पर फैलाना पड़ रहा था। यह सिर्फ़ आर्थिक तंगी नहीं थी, बल्कि एक मानसिक और भावनात्मक युद्ध था जो रामदीन हर पल अपने ही भीतर लड़ रहा था; उसकी पत्नी सावित्री की खाँसी अब रात के सन्नाटे में और भी डरावनी लगती थी, क्योंकि डॉक्टर ने जो महंगी दवाइयां लिखी थीं, उन्हें खरीदने के लिए रामदीन के पास अब पेंशन के चंद रुपयों के अलावा कुछ भी नहीं बचा था। वह बाज़ार जाता तो सबसे सस्ती और गली-सड़ी सब्ज़ियां चुनता, दूध वाले का हिसाब अगले महीने पर टालता, और पड़ोसियों से नज़रे चुराकर निकलता ताकि कोई यह न पूछ ले कि “दादा, वो आपकी बड़ी इन्वेस्टमेंट का क्या हुआ?”। एजेंट सुमित, जो पहले हर दूसरे दिन “अंकल जी” कहकर फोन करता था और लंबी-लंबी बातें करता था, अब उसने फोन उठाना लगभग बंद कर दिया था; कभी-कभार अगर फोन उठता भी, तो उधर से “नेटवर्क इश्यू” या “सर्वर डाउन” जैसे तकनीकी बहाने सुनाई देते, या फिर एक रूखी सी आवाज़ आती कि “अरे अंकल, आप चिंता क्यों करते हो, थोड़ा सब्र रखो, कंपनी का ऑडिट चल रहा है, पैसा सूद समेत मिलेगा।” रामदीन उन खोखले शब्दों को अमृत की तरह पी लेता, क्योंकि उसके पास विश्वास करने के अलावा और कोई विकल्प बचा ही नहीं था; अगर वह सच को स्वीकार कर लेता, तो शायद उसका दिल उसी क्षण बंद हो जाता। घर का माहौल इतना भारी हो चुका था कि साँस लेना भी दूभर था; दोनों बुजुर्ग पति-पत्नी एक-दूसरे से बातें छिपाने लगे थे—सावित्री अपने दर्द को छिपाती ताकि रामदीन परेशान न हो, और रामदीन अपनी उस भयानक गलती को छिपाता जो उसने लालच में आकर कर दी थी। कैलेंडर के पन्ने पलटते गए, त्यौहार आए और बिना किसी रौनक के चले गए, दिवाली पर घर में दिए नहीं जले, बस एक गहरा अन्धकार छाया रहा जो उनकी आत्माओं को निगल रहा था। भूख अब पेट की नहीं, बल्कि उस सच को जानने की थी जो उनसे छिपाया जा रहा था, और एक दिन जब रामदीन ने हिम्मत करके एजेंट के दफ्तर जाने का फैसला किया, तो उसे नहीं पता था कि वह जिस बस में चढ़ रहा है, वह उसे किसी दफ्तर नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी के सबसे बड़े सदमे की ओर ले जा रही है। बस से उतरते ही, उसने देखा कि जिस भव्य इमारत में सुमित का ऑफिस हुआ करता था, वहाँ अब एक अजीब सी वीरानी छायी हुई है, और यह वीरानी किसी अनहोनी का संकेत दे रही थी।
बारहवें महीने का कोहरा और एक भयानक सच
साल का आखिरी महीना यानी दिसंबर अपनी हाड़ कंपा देने वाली ठंड के साथ आया, लेकिन रामदीन के लिए यह ठंड मौसम की नहीं, बल्कि उसकी अपनी किस्मत की थी जो अब पूरी तरह से जम चुकी थी। उसकी पेंशन का आखिरी हिस्सा भी खत्म हो चुका था, और अब घर में राशन के डिब्बे पूरी तरह खाली पड़े थे, ठीक वैसे ही जैसे उसका बैंक अकाउंट और उसका भविष्य। एक साल पूरा होने की तारीख नज़दीक आ रही थी, वह तारीख जिसका इंतज़ार उसने 365 दिन, 8760 घंटे, और 525600 मिनट तक हर पल तिल-तिल कर मरते हुए किया था। आज वह “परिपक्वता दिवस” (Maturity Day) था, जिस दिन वादे के मुताबिक उसके हाथ में एक मोटी रकम का चेक होना चाहिए था, लेकिन सुबह से ही सुमित का फोन ‘कवरेज क्षेत्र से बाहर’ बता रहा था। घबराहट में, कांपते हाथों से अपनी पुरानी शॉल लपेटे, रामदीन ने शहर के उस कोने की ओर कदम बढ़ाए जहाँ वह आलीशान ऑफिस था, जहाँ कांच के दरवाज़े थे और ठंडी हवा फेंकते एसी लगे थे। जैसे-जैसे वह इमारत के करीब पहुँच रहा था, उसका दिल किसी हथौड़े की तरह पसलियों से टकरा रहा था; उसके मन में हजारों सवाल थे, लेकिन जुबां पर सिर्फ़ प्रार्थनाएं थीं। जब वह उस बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर पहुँचा, जहाँ कभी “समृद्धि इन्वेस्टमेंट्स” का चमचमाता बोर्ड लगा होता था, वहाँ का नज़ारा देखकर उसके पैरों में जैसे जान ही नहीं बची—वह कांच का दरवाज़ा, जो हमेशा उसके स्वागत के लिए खुला रहता था, आज उस पर एक मोटा, जंग लगा ताला लटक रहा था और उस पर धूल की एक ऐसी परत जमी थी जो बता रही थी कि यह दरवाज़ा पिछले कई हफ़्तों, शायद महीनों से नहीं खुला है। ऑफिस का बोर्ड गायब था, और अंदर का फर्नीचर, कंप्यूटर, फाइलें—सब कुछ नदारद था; वहाँ सिर्फ़ एक खाली, वीरान हॉल था जो रामदीन की बेवकूफी पर मूक अट्टहास कर रहा था। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा, वह दीवार का सहारा लेकर वहीं ज़मीन पर बैठ गया, उसकी साँसें फूलने लगीं, और एक साल का वह सन्नाटा जो उसने अपने भीतर पाल रखा था, अब एक भयानक चीख बनकर बाहर आने को बेताब था। तभी, बगल की दुकान से एक आदमी बाहर निकला, उसने रामदीन की हालत देखी और एक ऐसा वाक्य कहा जिसने रामदीन की रही-सही दुनिया को भी राख के ढेर में बदल दिया—”अरे बाबा, आप भी उस सुमित को ढूंढ रहे हो? वो तो दो महीने पहले ही पुलिस के डर से शहर छोड़कर भाग गया, और सुना है…” उस दुकानदार ने अपनी बात अधूरी छोड़कर एक पुरानी अखबार की कतरन रामदीन की ओर बढ़ाई, जिसकी हेडलाइन पढ़ते ही रामदीन की आँखों की पुतलियाँ स्थिर हो गईं और समय जैसे हमेशा के लिए थम गया।
बेचैनी का बवंडर: जब विश्वास की नींव दरकने लगी
वह रात साल की सबसे लंबी और काली रात महसूस हो रही थी, जहाँ समय की हर टिक-टिक मेरे सीने में दफन घबराहट को हथौड़े की तरह चोट पहुँचा रही थी, क्योंकि कैलेंडर की तारीख चीख-चीख कर गवाही दे रही थी कि जिस वादे पर मैंने अपनी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी दांव पर लगा दी थी, उस वादे की मियाद आज पूरी हो चुकी थी। कमरे में पसरा हुआ सन्नाटा किसी भूतिया साये की तरह मेरे गले को दबोच रहा था, और बाहर होती मूसलाधार बारिश की बूंदें खिड़की के शीशे पर ऐसे टकरा रही थीं मानो वे मेरे भीतर चल रहे तूफानों का ही एक विद्रूप प्रतिबिंब हों, जिन्होंने मेरी नींद, मेरा चैन और मेरी रूह के सुकून को पूरी तरह से निगल लिया था। मेरी मेज पर रखा वो पुराना फोन, जो कभी मेरे और विक्रम के बीच की अटूट दोस्ती का सेतु हुआ करता था, आज एक बम की तरह लग रहा था जिसे छूने से भी मुझे डर लग रहा था, क्योंकि मेरे मन के किसी कोने में एक अनजाना भय कुंडली मारकर बैठा था कि अगर उधर से कोई जवाब नहीं आया, तो मेरी दुनिया ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी। मैंने कांपते हुए हाथों से उसका नंबर मिलाया, हर एक रिंग के साथ मेरी धड़कनें किसी तेज रफ्तार ट्रेन की तरह भाग रही थीं, और हर बार जब वह रिंग एक लंबी, अंतहीन ‘बीप’ के बाद वॉयस-मेल में तब्दील हो जाती, तो मेरे माथे पर पसीने की बूंदें किसी ठंडे जहर की तरह उभर आती थीं। यह केवल पैसे का सवाल नहीं था, यह उस भरोसे का सवाल था जो मैंने एक भाई से बढ़कर माने जाने वाले दोस्त पर किया था, जिसने मुझे सुनहरे सपनों के बाग दिखाए थे, जिसने कहा था कि “एक साल रुक जा, तेरी किस्मत बदल दूंगा,” लेकिन अब जब वो साल बीत चुका था, तो किस्मत तो नहीं बदली, हाँ, मेरी रूह जरूर कांप रही थी। मैंने खुद को तसल्ली देने की हजार कोशिशें कीं कि शायद वह किसी मुसीबत में होगा, शायद नेटवर्क की समस्या होगी, या शायद वह मुझे सरप्राइज देने के लिए आ रहा होगा, लेकिन दिल का वो चोर बार-बार कह रहा था कि कुछ बहुत गलत हो चुका है, कुछ ऐसा जो मेरी बर्बादी की दास्तां लिखने वाला है। घंटों बीत गए, मैंने दर्जनों बार नंबर मिलाया, वाट्सऐप पर मैसेज किए जो ‘डिलीवर’ तो हो रहे थे लेकिन ‘सीन’ नहीं हो रहे थे, और इस डिजिटल चुप्पी ने मुझे पागलपन की हद तक पहुँचा दिया था, मैं कमरे में पागलों की तरह टहल रहा था, अपनी ही परछाई से सवाल पूछ रहा था, और तभी, जब उम्मीद की आखिरी किरण भी दम तोड़ने वाली थी, मेरे फोन की स्क्रीन एक अनजान नंबर से जगमगा उठी, और उस स्क्रीन को देखते ही मेरा खून जम गया।
शब्दों का मायाजाल: झूठे वादे और बदलती आवाजें
मैंने थरथराते हाथों से फोन उठाया, और दूसरी तरफ से जो आवाज आई, वह विक्रम की थी, लेकिन उसमें वह अपनापन, वह गर्मजोशी, और वह आत्मविश्वास नदारद था जो कभी उसकी पहचान हुआ करता था; इसके बजाय, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी, एक रूखापन और एक ऐसी हड़बड़ाहट थी जैसे कोई रंगे हाथों पकड़ा गया मुजरिम अपनी सफाई पेश करने की कोशिश कर रहा हो। उसने न तो दुआ-सलाम की, न ही देरी के लिए माफी मांगी, बस सीधे एक अजीबोगरीब कहानी शुरू कर दी कि कैसे बैंक के सर्वर क्रैश हो गए हैं, कैसे सरकारी ऑडिट की वजह से सारे खाते फ्रीज कर दिए गए हैं, और कैसे वह खुद एक बहुत बड़ी मुसीबत में फंसा हुआ है जहाँ उसे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है। मैं उसकी हर एक बात को ध्यान से सुन रहा था, लेकिन मेरा दिमाग चीख-चीख कर कह रहा था कि यह सब झूठ है, एक ऐसा सफेद झूठ जिसे वह इतनी सफाई से बोल रहा था मानो वह मुझे कोई लोरी सुनाकर सुलाना चाहता हो, ताकि मैं अपने ही पैसे मांगना भूल जाऊं। उसकी बातों में विरोधाभास था, कभी वह कहता कि वह शहर से बाहर है, तो कभी कहता कि वह बैंक मैनेजर के केबिन में बैठा है, लेकिन बैकग्राउंड में आ रही आवाज़ें—शराब के गिलासों के टकराने की खनक और धीमी संगीत की धुनें—कुछ और ही कहानी बयां कर रही थीं, जो मेरे शक को यकीन में बदलने के लिए काफी थीं। मैंने जब उससे कड़े शब्दों में पूछा कि आखिर मेरा पैसा मुझे कब मिलेगा, तो उसका लहज़ा अचानक बदल गया, वह आक्रामक हो गया, उसने मुझे ही दोषी ठहराना शुरू कर दिया कि मैं उस पर भरोसा नहीं करता, कि मैं एक लालची इंसान हूँ जो अपने दोस्त की मजबूरी नहीं समझ सकता। यह ‘गैसलाइटिंग’ का ऐसा भयंकर रूप था जिसने मुझे पल भर के लिए आत्मग्लानि से भर दिया, लेकिन फिर मुझे याद आया कि वह पैसा मेरी मेहनत की कमाई थी, मेरे बच्चों के भविष्य की नींव थी, जिसे उसने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में फंसाकर हड़प लिया था। फोन कटने के बाद, मैं सुन्न होकर फर्श पर बैठ गया, मेरे कानों में अब भी उसके वो खोखले शब्द गूंज रहे थे, “अगले हफ्ते पक्का, भाई,” लेकिन मैं जानता था कि वह ‘अगला हफ्ता’ कभी नहीं आने वाला था, और तभी मेरी नज़र लैपटॉप की स्क्रीन पर पड़ी जहाँ उसका सोशल मीडिया प्रोफाइल खुला हुआ था, और जो मैंने वहां देखा, उसने मेरे पैरों तले से जमीन खींच ली।
मेज पर रखा पुराना टेलीफोन जिस पर कभी घंटी नहीं बजती।
पर्दाफाश: उस बंद दरवाजे के पीछे का सच
अगली सुबह का सूरज मेरे लिए रोशनी नहीं, बल्कि हकीकत का एक कड़वा तमाचा लेकर आया, क्योंकि रात भर की करवटों और आंसुओं के बाद मैंने फैसला कर लिया था कि अब फोन पर बात करने का वक्त खत्म हो चुका है और मुझे उस दफ्तर तक जाना ही होगा जहाँ मैंने एक साल पहले अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती की थी। शहर की भीड़भाड़ को चीरते हुए जब मैं उस पॉश इलाक़े की इमारत के सामने पहुंचा, तो मेरा दिल किसी पिंजरे में बंद पक्षी की तरह फड़फड़ा रहा था, हर कदम पर मुझे विक्रम का वो हंसता हुआ चेहरा याद आ रहा था जिसने मुझे गले लगाकर कहा था, “हम दोनों मिलकर इतिहास रचेंगे,” लेकिन जैसे ही मैं लिफ्ट से तीसरी मंजिल पर पहुँचा और उस कॉरिडोर में कदम रखा, वहाँ एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था जो किसी श्मशान की याद दिला रहा था। जिस जगह पर कभी ‘विक्रम एंटरप्राइजेज’ का चमचमाता हुआ बोर्ड लगा होता था, जहाँ रिसेप्शन पर लोगों की कतारें होती थीं, और जहाँ से नोट गिनने की मशीनों की आवाज़ें आती थीं, आज वहां धूल की एक मोटी परत जमी हुई थी और कांच के दरवाजों पर एक बड़ा, जंग लगा हुआ ताला लटक रहा था जो मेरी मूर्खता पर मुँह चिढ़ाता हुआ प्रतीत हो रहा था। मैंने अविश्वास में अपनी आँखें मलीं, धड़कते दिल के साथ पास के कार्यालय के चपरासी से पूछताछ की, तो उसने जो बताया वह किसी डरावनी फिल्म की पटकथा से कम नहीं था—उसने बताया कि विक्रम तो छह महीने पहले ही रातों-रात अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर गायब हो गया था, और मेरे जैसे दर्जनों लोग रोज यहाँ आकर अपना सिर पीटते हैं और खाली हाथ लौट जाते हैं। मेरे कानों में एक तीखी सीटी बजने लगी, मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा, और मुझे महसूस हुआ कि मेरे शरीर से सारी ताकत निचोड़ ली गई है; मैं वहीं घुटनों के बल गिर पड़ा, उस बंद दरवाजे को घूरता रहा जिसके पीछे मेरे सपनों की लाश पड़ी थी। लेकिन कहानी का अंत यहाँ नहीं था, क्योंकि जब मैं बदहवास होकर वहां से निकलने लगा, तो मेरी नजर दरवाजे के नीचे दबे एक आधे फटे हुए लिफाफे पर पड़ी, जिसे मैंने कांपते हाथों से उठाया और जब मैंने उसे खोला, तो उसमें एक फ्लाइट का टिकट और एक ऐसा दस्तावेज था जिसने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह खेल सिर्फ पैसों का नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी, सोची-समझी साजिश का था जिसका मोहरा मैं बन चुका था।
धूल जमी फाइलों में दबी वो खौफनाक सच्चाई और विश्वास का अंतिम संस्कार
उस कमरे की हवा में एक अजीब सी भारीपन और सीलन थी, मानो दीवारों ने पिछले एक साल से हर उस झूठ को सोख लिया हो जो इस घर की नींव को दीमक की तरह चाट रहा था, और अब जब विक्रम के कांपते हाथों में वो आखिरी बैंक स्टेटमेंट था, तो समय जैसे अपनी गति भूलकर ठहर सा गया था। बाहर हो रही मूसलाधार बारिश की बूंदें खिड़की के शीशे पर ऐसे टकरा रही थीं जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे रोकने की कोशिश कर रही हो, लेकिन विक्रम की आँखों के सामने वो आंकड़े नाच रहे थे जो सिर्फ गणित के नंबर नहीं थे, बल्कि उसके जीवन की उस कमाई का हिसाब थे जिसे उसने अपनी रातों की नींद और सुकून गिरवी रखकर कमाया था। एक साल का वो जानलेवा सन्नाटा, जिसने उसे मानसिक रूप से एक जिंदा लाश बना दिया था, अब धीरे-धीरे अपनी जुबान खोल रहा था, और वो जुबान इतनी कड़वी थी कि विक्रम के गले में अटक सा गया था; हर पन्ना पलटने के साथ एक नया राज़, एक नई तारीख और एक नया ट्रांजेक्शन सामने आ रहा था, जो सीधे उस एक खाते की ओर इशारा कर रहा था जिसके बारे में उसने सपने में भी शक नहीं किया था। जिस पैसे को वो किसी बाहरी साजिश, किसी बड़े घोटाले या किसी अनजान दुश्मन की चाल समझ रहा था, वो दरअसल एक ऐसे दीमक का काम था जो उसी की छत के नीचे, उसी की थाली में खाकर उसी की जड़ों को खोखला कर रहा था। कमरे में जल रही मध्यम रोशनी वाली लैंप की परछाईं दीवार पर एक डरावने राक्षस जैसी आकृति बना रही थी, जो विक्रम की अपनी ही परछाईं थी, एक ऐसे आदमी की परछाईं जो अपनी बर्बादी का दस्तावेज़ पढ़ रहा था और उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस इंसान पर उसने आँख मूंदकर भरोसा किया, उसी ने उसे पाई-पाई के लिए मोहताज करने की साजिश रची थी। पसीने की बूंदें उसके माथे से टपककर उस कागज पर गिर रही थीं, जिससे स्याही थोड़ी फैल गई थी, ठीक वैसे ही जैसे उसकी जिंदगी का नक्शा अब धुंधला पड़ चुका था। उसने अपनी सूखी हुई आँखों को जोर से भींचा, इस उम्मीद में कि जब वो आँखें खोलेगा तो ये सब एक बुरा सपना साबित होगा, लेकिन हकीकत की वो क्रूर रोशनी उसकी पलकों को भेदकर अंदर घुस रही थी, उसे चीख-चीखकर बता रही थी कि वो पैसा किसी हवा में गायब नहीं हुआ, बल्कि उसे व्यवस्थित तरीके से, किश्तों में, एक बहुत ही शातिर दिमाग ने अपनी अय्याशियों और गुप्त कर्जों को चुकाने के लिए इस्तेमाल किया था। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र उस आखिरी पन्ने के नीचे हस्ताक्षर करने वाले के नाम पर पड़ी, उसके पैरों तले से ज़मीन ही नहीं खिसकी, बल्कि उसका पूरा अस्तित्व ही डगमगा गया, क्योंकि वो नाम किसी और का नहीं, बल्कि उस शख्स का था जिसे वो अपनी परछाईं से भी ज्यादा करीब मानता था।
रिश्तों के कत्ल का वो मंजर और एक खोखली माफी
जैसे ही विक्रम ने उस बंद दरवाजे को धक्का दिया, उसके सामने बैठा वो शख्स, जो अब तक उसकी जिंदगी का सबसे मजबूत स्तंभ हुआ करता था, अब एक अपराधी की तरह सिर झुकाए बैठा था, और कमरे में फैला वो सन्नाटा अब किसी विस्फोटक की तरह लग रहा था जो किसी भी पल फटकर सब कुछ तबाह कर सकता था। विक्रम के अंदर का ज्वारभाटा उफान पर था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो चिल्लाए, रोए या फिर उस इंसान का गिरेबान पकड़कर पूछे कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया, लेकिन उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था, बस उसकी सांसें तेज चल रही थीं और दिल की धड़कनें कानों में हथौड़े की तरह बज रही थीं। सामने बैठे उसके अपने सगे भाई, रोहित ने जब धीरे से अपनी नज़रें उठाईं, तो उन आँखों में पछतावा कम और एक अजीब सी बेबसी ज्यादा थी, वो बेबसी जो जुए की लत और शेयर बाजार के अंधे कुएं में गिरने वाले हर उस इंसान की आँखों में होती है जो वापसी का रास्ता भूल चुका होता है। रोहित ने अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में जब बताना शुरू किया कि कैसे एक छोटी सी गलती को छिपाने के लिए उसने दूसरा झूठ बोला, और फिर उस झूठ को सच साबित करने के लिए पैसों की हेराफेरी शुरू की, तो विक्रम को लगा कि कोई उसके शरीर से मांस का एक-एक टुकड़ा नोच रहा है। वो “एक साल का सन्नाटा” दरअसल रोहित की उस डरपोक खामोशी का नाम था, जिसमें उसने विक्रम को अंधेरे में रखा, उसे इधर-उधर भटकने दिया, उसे पुलिस और वकीलों के चक्कर लगवाए, जबकि वो खुद जानता था कि वो पैसा कभी वापस नहीं आएगा क्योंकि वो तो धुएं और शराब की बोतलों में, और कभी न जीतने वाले दांवों में बहुत पहले ही उड़ चुका था। विक्रम सुनता रहा, पत्थर की मूरत बनकर, महसूस करते हुए कि कैसे खून के रिश्ते की वो डोर, जिसे वो लोहे की जंजीर समझता था, दरअसल कच्चे धागे से भी ज्यादा कमजोर निकली, जो सिर्फ पैसे के भार से टूट गई। कमरे की हवा में अब भाईचारे की खुशबू नहीं, बल्कि विश्वासघात की सड़ी हुई दुर्गंध थी, और रोहित के हर “मुझे माफ़ कर दो” के साथ विक्रम के अंदर कुछ मर रहा था, कुछ ऐसा जो पैसों से कहीं ज्यादा कीमती था—उसका इंसानियत पर से भरोसा। उसने महसूस किया कि पैसा तो शायद वो दोबारा कमा लेगा, मेहनत करके, दिन-रात एक करके, लेकिन जो मासूमियत और जो विश्वास आज इस कमरे की चारदीवारी के भीतर दम तोड़ रहा था, उसका पुनर्जन्म कभी नहीं हो सकता। रोहित घुटनों के बल बैठकर रो रहा था, लेकिन विक्रम को उन आंसुओं में सिर्फ मगरमच्छ का दिखावा नज़र आ रहा था, और तभी उसे एहसास हुआ कि सबसे बड़ी सजा पैसा खोना नहीं है, बल्कि उस इंसान को खो देना है जिसे आप जानते थे, जबकि वो इंसान अभी भी आपके सामने जिंदा खड़ा हो। और फिर रोहित ने एक ऐसा सच उगला जिसने विक्रम की बची-कुची दुनिया को भी राख कर दिया, एक ऐसी बात जिसने साबित कर दिया कि ये चोरी मजबूरी में नहीं, बल्कि जलन और हसद की आग में की गई थी।
गरीबी और पेंशन के सहारे चल रहे जीवन को दर्शाता एक छोटा कमरा।
और अंत में… सन्नाटे की गूंज जो जिंदगी भर साथ रहेगी
अंततः, जब विक्रम उस घर से बाहर निकला, तो भोर का धुंधला प्रकाश आसमान में फैल रहा था, लेकिन उसके अंदर का अंधेरा उस सुबह की रोशनी से कहीं ज्यादा गहरा और घना था, क्योंकि उसे अपनी मंजिल तो मिल गई थी—उसे पता चल गया था कि पैसा कहाँ गया—लेकिन इस सत्य की कीमत उसे अपने सबसे पवित्र रिश्ते की बलि देकर चुकानी पड़ी थी। वो सड़क के किनारे एक पुरानी बेंच पर बैठ गया, जहाँ से शहर का नज़ारा दिखाई देता था,
गरीबी और पेंशन के सहारे चल रहे जीवन को दर्शाता एक छोटा कमरा।
, और उसने एक लंबी, गहरी सांस ली, जिसमें रात की ठंडक और दिन की गर्मी का मिला-जुला अहसास था, ठीक वैसे ही जैसे उसके दिल में राहत और दर्द का एक अजीब सा मिश्रण था। उसने सोचा कि जीवन भी कितना अजीब है, हम पैसों के पीछे भागते हैं, उसे सुरक्षा की गारंटी मानते हैं, लेकिन वही पैसा जब अपनों के बीच आता है, तो वो सुरक्षा नहीं बल्कि विनाश का कारण बन जाता है; वो कागज के टुकड़े जिन्हें हम तिजोरियों में बंद करते हैं, वो दरअसल हमारे रिश्तों की तिजोरियों को खाली कर देते हैं। विक्रम ने अपनी जेब से वो सिगरेट का पैकेट निकाला जिसे उसने सालों पहले छोड़ दिया था, एक सिगरेट जलाई और धुएं के छल्लों में अपनी उस एक साल की जद्दोजहद को उड़ते हुए देखा। उसने स्वीकार कर लिया कि वो पैसा अब कभी वापस नहीं आएगा, वो एक ऐसा कर्ज था जो उसने किस्मत को चुका दिया ताकि वो ये सबक सीख सके कि “खामोशी” कभी भी बेवजह नहीं होती, हर सन्नाटे के पीछे एक शोर छिपा होता है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि हम सच का सामना करने से डरते हैं। उसने तय किया कि वो पुलिस में नहीं जाएगा, क्योंकि रोहित को जेल भेजने से उसका पैसा तो वापस नहीं आएगा, लेकिन वो एक और तमाशा नहीं बनाना चाहता था; उसने रोहित को उसकी ही नज़रों में गिराकर, उसे उसकी ही अंतरात्मा की अदालत में उम्रकैद की सज़ा दे दी थी, जो शायद जेल की सलाखों से कहीं ज्यादा बदतर थी। विक्रम उठा, अपने कोट की धूल झाड़ी और उगते हुए सूरज की तरफ देखा, यह जानते हुए कि आज से उसकी जेब भले ही खाली हो, लेकिन उसकी रूह उस बोझ से आज़ाद हो चुकी है जो उसने पिछले 365 दिनों से ढोया था। वो एक नई शुरुआत की ओर कदम बढ़ा रहा था, लेकिन उसके जूतों की आवाज़ के साथ-साथ एक गूंज भी चल रही थी, वो गूंज जो उसे ताउम्र याद दिलाती रहेगी कि सबसे गहरा घाव तलवार का नहीं, बल्कि धोखे का होता है। जैसे ही उसने मुड़कर उस घर की तरफ आखिरी बार देखा, उसे खिड़की पर एक परछाईं हिलती हुई दिखाई दी, और उसे अचानक लगा कि यह कहानी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, क्योंकि विश्वासघात का ज़हर कभी भी पूरी तरह से शरीर से नहीं निकलता, वो बस नसों में छिपकर वक्त का इंतज़ार करता है।
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