अध्याय 1: वह सन्नाटा जो तूफान से पहले आया – लंदन की एक नीरस दोपहर और ‘सैंडविच’ नाम का सबसे बड़ा छलावा

यह लंदन की वह उदास, सीलन भरी और भूरे बादलों से ढकी हुई दोपहर थी, जहाँ सूरज भी बादलों के पीछे छिपकर मानो नीचे चल रहे इस पाक-कला के मजाक को देखने से कतरा रहा था, और मैं एक ऐसे कैफे में बैठा था जिसकी दीवारों का रंग और वहाँ बैठे लोगों के चेहरे के भाव एक जैसे ही फीके और उत्साहहीन थे। मेरे सामने एक कांच की खिड़की थी जिससे बाहर की बूंदाबांदी दिख रही थी, लेकिन मेरा पूरा ध्यान, मेरी पूरी चेतना और मेरे पेट की अंतरात्मा उस छोटी, बेजान, सफेद चीनी मिट्टी की प्लेट पर केंद्रित थी जो वेटर ने अभी-अभी ‘मिस्टर स्मिथ’ के सामने रखी थी, और जिसे देखकर मिस्टर स्मिथ की आँखों में वैसी ही चमक आ गई थी जैसी किसी भारतीय को छप्पन भोग की थाली देखकर आती है। उस प्लेट के बीचों-बीच, अत्यंत सलीके से, ज्यामितीय शुद्धता के साथ त्रिकोण आकार में कटा हुआ वह पदार्थ रखा था जिसे ये लोग ‘सैंडविच’ कहते हैं—दो बर्फ जैसी सफेद ब्रेड की स्लाइसें, जिनके बीच में एक बेचारी, मुरझाई हुई सलाद की पत्ती अपने अस्तित्व की आखिरी सांसें गिन रही थी, और उसके साथ पनीर का एक ऐसा पारदर्शी टुकड़ा था जिसे देखकर लग रहा था कि अगर मैंने जोर से सांस ली तो वह हवा में उड़ जाएगा। यह दृश्य किसी भी सच्चे भारतीय भोजना प्रेमी के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था, क्योंकि हमारे यहाँ तो इतना खाना हम केवल चखने के लिए मांगते हैं कि ‘नमक ठीक है या नहीं’, लेकिन यहाँ, इस पश्चिमी सभ्यता के केंद्र में, इसे ‘लंच’ का नाम दिया जा रहा था। आस-पास की खामोशी इतनी गहरी थी कि मैं उस ब्रेड के सूखेपन को महसूस कर सकता था, और जब मिस्टर स्मिथ ने अपनी छुरी और कांटे—हाँ, भगवान गवाह है, उन्होंने सैंडविच खाने के लिए छुरी और कांटे उठाए—को उस निरीह सैंडविच की तरफ बढ़ाया, तो मुझे लगा कि यह केवल भोजन का अपमान नहीं है, बल्कि भूख की उस आदिम भावना के साथ एक क्रूर मजाक है जो सदियों से मानव सभ्यता को चला रही है। वेटर वहां से जा चुका था, लेकिन हवा में एक अजीब सा तनाव छोड़ गया था, एक ऐसा अदृश्य भारीपन जो मेरे पेट में कुलबुलाहट पैदा कर रहा था, क्योंकि मैं जानता था कि यह मात्र शुरुआत है, और अभी मुझे उस विडंबना का साक्षी बनना है जिसे पश्चिमी दुनिया ‘संतुलित आहार’ कहती है, लेकिन जो असल में पेट के साथ किया गया इतिहास का सबसे बड़ा विश्वासघात होने वाला था।
पश्चिमी भ्रम का मायाजाल: जब ‘पेट भरना’ और ‘मन भरना’ दो अलग ध्रुव बन जाते हैं
मिस्टर स्मिथ के चेहरे पर वह ‘संतोष’ की मुस्कान, जिसे देखकर मुझे ईर्ष्या और दया का मिला-जुला अनुभव हो रहा था, वास्तव में पश्चिमी सभ्यता की उस गहरी, दार्शनिक भ्रांति का प्रतीक थी जो यह मानती है कि भोजन केवल शरीर को चलाने वाला ईंधन है, न कि आत्मा को तृप्त करने वाला उत्सव। मैंने उन्हें उस सैंडविच के पहले टुकड़े को मुंह में डालते हुए देखा—उन्होंने उसे ऐसे उठाया जैसे वह कोहिनूर हीरा हो, और फिर उसे इतनी धीमी गति से चबाना शुरू किया कि मुझे लगा शायद वे भोजन का स्वाद नहीं ले रहे, बल्कि उसके अणुओं की गणना कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि कहीं गलती से एक कैलोरी ज्यादा तो शरीर में प्रवेश नहीं कर गई। यह दृश्य मेरे लिए किसी मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्म के उस दृश्य जैसा था जहाँ सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन सतह के नीचे कुछ बहुत ही भयानक चल रहा होता है; यहाँ भयानक यह था कि एक छह फुट लंबा, हट्टा-कट्टा इंसान यह मानकर चल रहा था कि गेहूँ की दो पतली परतों और बीच में दबी हुई हवा से उसकी भूख शांत हो जाएगी। हमारे भारत में, जहाँ भोजन का अर्थ है थाली के किनारों से बाहर गिरता हुआ रसा, चावलों का पहाड़ और रोटियों की मीनार, वहाँ इस ‘मिनिमलिज्म’ या न्यूनतमवाद को देखना किसी सांस्कृतिक आघात से कम नहीं था। वे हर निवाले के बाद एक घूंट पानी पीते, और फिर नैपकिन से अपने होंठों को ऐसे पोंछते जैसे उन्होंने अभी-अभी किसी महाभोज का समापन किया हो, जबकि हकीकत में अभी तो मेरे पेट के पाचक रसों ने अपना वार्म-अप भी शुरू नहीं किया था। उनकी आँखों में वह शांति थी जो अज्ञानता से आती है, वह शांति जो कहती है कि “मुझे नहीं पता कि मसालों का विस्फोट क्या होता है,” “मुझे नहीं पता कि जब घी से लथपथ पराठा गले से नीचे उतरता है तो आत्मा कैसे नृत्य करती है,” और यह अज्ञानता ही उनका कवच थी, उनका वह पश्चिमी भ्रम था जिसमें वे जी रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे वह सैंडविच उनकी प्लेट से गायब होता जा रहा था, मेरे भीतर का भारतीय ‘अन्नपूर्णा’ का भक्त चीख-चीख कर कह रहा था कि यह पेट भरना नहीं है, यह तो बस पेट को चुप कराना है, उसे बहलाना है, उसे झूठ बोलना है कि खाना मिल गया है, जबकि वास्तव में यह केवल एक धोखा है, और इस धोखे की सबसे खतरनाक बात यह थी कि वे इसे पूरी ईमानदारी और खुशी के साथ स्वीकार कर रहे थे, बिना यह जाने कि उनकी यह ‘संतुष्ट मुस्कान’ मेरे भीतर एक ऐसा ज्वालामुखी जगा रही थी जो फटने के लिए बिल्कुल तैयार था।
खामोश चीखें और खाली पेट: वह सन्नाटा जो यह बता रहा था कि असली भूख अभी बाकी है
जैसे ही वह अंतिम टुकड़ा उनके मुंह में गया और वह प्लेट—जो पहले भी खाली ही लग रही थी और अब आधिकारिक रूप से खाली हो चुकी थी—वहां चमकने लगी, तो एक अजीब सा सन्नाटा हमारे बीच छा गया, एक ऐसा सन्नाटा जो किसी तूफान के आने की पूर्व सूचना देता है। मिस्टर स्मिथ ने अपनी कुर्सी पीछे की ओर खिसकाई, अपने पेट पर हाथ फेरा—एक ऐसी हरकत जिसे देखकर मुझे लगा कि वे मेरा मजाक उड़ा रहे हैं—और एक लंबी, गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, “ओह, दैट वाज़ हैवी, आई एम स्टफ्ड” (ओह, यह काफी भारी था, मेरा पेट भर गया), और ये शब्द मेरे कानों में किसी पिघले हुए शीशे की तरह उतरे। भारी? पेट भर गया? किस चीज़ से? उस हवा के झोंके से जिसे आपने अभी-अभी निगला है? मेरे दिमाग में मेरे घर की रसोई की तस्वीरें घूमने लगीं—कड़ाही में छनछनाता हुआ तेल, हींग और जीरे की वह नशीली खुशबू जो पड़ोसी के घर तक जाती है, राजमा चावल की वह विशाल थाली जिसके बाद इंसान को हिलने के लिए भी क्रेन की आवश्यकता पड़ती है—और उसकी तुलना में यह दृश्य किसी बंजर रेगिस्तान जैसा लग रहा था। मेरा अपना पेट, जो अभी तक केवल एक मूक दर्शक था, अब इस अन्याय के खिलाफ विद्रोह करने लगा था, गड़गड़ाने लगा था, मानो वह मुझसे पूछ रहा हो कि “क्या हम सच में इसे भोजन मानकर यहाँ से उठने वाले हैं?” यह केवल भूख नहीं थी, यह एक अस्तित्व का संकट था; यह प्रश्न था कि क्या जीवन केवल जीने के लिए है या स्वाद लेने के लिए? उनकी ‘फुलनेस’ या तृप्ति की परिभाषा और मेरी तृप्ति की परिभाषा के बीच में अटलांटिक महासागर जितना चौड़ा फासला था, और उस पल मुझे समझ आया कि हम केवल दो अलग-अलग देशों के लोग नहीं हैं, हम दो अलग-अलग ब्रह्मांडों के निवासी हैं जहाँ भौतिकी के नियम भी अलग-अलग काम करते हैं। मैंने अपनी कॉफी के कप को कसकर पकड़ा, अपनी उंगलियों को सफेद होते हुए देखा, क्योंकि मैं जानता था कि अगर मैंने अभी कुछ नहीं किया, तो यह ‘स्नैक’ के नाम पर हो रहा धोखा मुझे पागल कर देगा। लेकिन असली कहानी तो तब शुरू हुई जब मैंने वेटर को वापस आते हुए देखा, और मुझे लगा कि शायद अब मुख्य भोजन आएगा, शायद यह सैंडविच केवल एक स्टार्टर था, एक क्षुधावर्धक था, लेकिन वेटर ने आकर जो किया, उसने मेरी उम्मीदों की बची-खुची राख को भी ठंडे पानी में बहा दिया और मेरे सब्र का बांध अंततः टूटने की कगार पर ला खड़ा किया।
पश्चिमी सभ्यता का वहम और भारतीय पेट का महा-संग्राम: जब पिज़्ज़ा और बर्गर मात्र ‘चखना’ बन गए
एक भारतीय शादी या भव्य पार्टी का वह दृश्य याद कीजिये, जहाँ रौशनी से नहलाया हुआ ‘लॉन’ किसी युद्ध के मैदान से कम नहीं लगता, और इस मैदान में खड़ा आपका मासूम पेट एक ऐसे छल का शिकार होने जा रहा है जिसका उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं है; हवाओं में तैरती हुई मक्खन और मसालों की वह नशीली खुशबू आपके नथुनों से होते हुए सीधे आपके दिमाग के उस हिस्से पर कब्ज़ा कर लेती है जो तर्क और संयम की बातें करता है, और यहीं से शुरू होता है वह ऐतिहासिक धोखा जिसे हम ‘स्नैक्स’ या ‘स्टार्टर्स’ के नाम से जानते हैं। अभी तो आपके पेट ने गोलगप्पों के तीखे पानी और टिक्की की करारी पपड़ी के सदमे से उबरने की कोशिश ही शुरू की थी कि तभी आपकी नज़र उस ‘लाइव काउंटर’ की तरफ उठती है जहाँ पश्चिमी दुनिया के तथाकथित ‘संपूर्ण भोजन’ यानी पिज़्ज़ा और पास्ता को हमारे हलवाई भाइयों ने अपनी कढ़ाई में डालकर एक नया ही रूप दे दिया है, जहाँ चीज़ की मोटी परतें किसी बर्फीली चादर की तरह मैदे की रोटियों को ढक रही हैं और ओवन से निकलती हुई वह गर्म भाप आपको सम्मोहित करने के लिए काफी है। यह वह क्षण है जब एक साधारण इंसान का संकल्प पिघलते हुए चीज़ की तरह बहने लगता है, क्योंकि उसे लगता है कि “अरे, यह तो बस स्टार्टर है, अभी तो असली खाना बाकी है,” और इसी गलतफहमी में वह एक ऐसे चक्रव्यूह में कदम रख देता है जहाँ से तृप्ति के साथ लौटना नामुमकिन है, क्योंकि प्लेट में रखा वह पिज़्ज़ा का टुकड़ा इटली का वह हल्का-फुल्का नाश्ता नहीं है, बल्कि यह एक देसी, मसालेदार, और अमूल चीज़ में डूबा हुआ वह ‘हथियार’ है जो आपकी भूख को मिटाने के लिए नहीं, बल्कि उसे हमेशा के लिए खामोश करने के लिए बनाया गया है, और जैसे ही आप उस गर्म, लचलच करते चीज़ वाले टुकड़े को उठाते हैं, आपको अहसास ही नहीं होता कि आपके पीछे खड़ा वेटर एक और तबाही लेकर मुस्कुरा रहा है।
‘इतालवी’ पास्ता का भारतीयकरण: सफ़ेद सॉस का वह भारी-भरकम प्रहार

जैसे ही आप पिज़्ज़ा के उस भारी-भरकम टुकड़े को निगलने की जद्दोजहद कर रहे होते हैं, तभी आपके सामने ‘व्हाइट सॉस पास्ता’ का एक पहाड़ खड़ा कर दिया जाता है, जिसे पश्चिमी देशों में शायद दोपहर का पूरा खाना माना जाता होगा, लेकिन यहाँ, इस रंगीन शामियाने के नीचे, यह महज एक ‘हल्का-फुल्का’ आइटम है जिसे खड़े-खड़े, बातों-बातों में खा लिया जाना चाहिए। यह पास्ता वह नहीं है जिसे ‘अल-दांते’ पकाया गया हो, बल्कि यह भारतीय मसालों, ढेर सारी क्रीम, और मैदा के उस गाढ़े घोल में पकाया गया है जो पेट में जाते ही किसी सीमेंट की तरह जमने लगता है; हर एक पेनने पास्ता का टुकड़ा सफ़ेद मलाईदार समुद्र में गोता लगाकर इतना भारी हो चुका है कि उसे उठाने के लिए भी कांटे (fork) को मशक्कत करनी पड़ती है, और जब यह चिकना, मखमली, लेकिन बेहद खतरनाक पदार्थ आपके गले से नीचे उतरता है, तो आपको एक अजीब सी, भारी तृप्ति का अहसास होता है जो एक चेतावनी भी है। आपके दिमाग का एक कोना चीख-चीख कर कह रहा है कि “बस करो, जगह भर चुकी है,” लेकिन आपकी जीभ, उस क्रीमी टेक्सचर और ऊपर से छिड़के गए ओरेगेनो और चिली फ्लेक्स के मोहपाश में ऐसी बंधी है कि वह रुकने का नाम नहीं लेती, यह जानते हुए भी कि यह सफ़ेद सॉस पेट के अंदर जाकर किसी भारी पत्थर की तरह बैठने वाला है। आप एक के बाद एक चम्मच मुँह में डालते जाते हैं, यह सोचते हुए कि यह तो बस ‘चखना’ है, यह तो बस पेट को बहलाने का एक तरीका है, जबकि हकीकत में, यह आपके पाचन तंत्र के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश है जो आपको उस अवस्था में पहुँचा रही है जहाँ साँस लेना भी एक चुनौती बन जाएगा, लेकिन तभी, आपकी धुंधली होती नज़रों के सामने एक और ट्रे आती है, और एक नई, खौफनाक खुशबू आपके होश उड़ाने के लिए तैयार खड़ी होती है।
नन्हें बर्गरों का विशाल धोखा: जब ‘स्लाइडर्स’ ने किया पेट का अपहरण
अगर आपको लगा था कि पिज़्ज़ा और पास्ता के बाद रहम की कोई गुंजाइश होगी, तो आप भारतीय मेजबानी की क्रूरता को कम आंक रहे हैं, क्योंकि अब बारी आती है उन छोटे, मासूम दिखने वाले ‘मिनी-बर्गर्स’ या ‘स्लाइडर्स’ की, जो दिखने में तो किसी खिलौने जैसे लगते हैं, लेकिन उनके अंदर भरा हुआ मसाला और आलू की टिक्की किसी परमाणु बम से कम नहीं होती। हम भारतीय अक्सर आकार को देखकर यह मान लेते हैं कि “अरे, यह तो इतना नन्हा सा है, इससे क्या ही होगा,” और यही वह सबसे बड़ी गलती है जो उस रात आप करते हैं; आप एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन-चार मिनी बर्गर अपनी प्लेट में रख लेते हैं, यह भूलकर कि उनके अंदर दबा हुआ वह मक्खन में तला हुआ बन और पनीर का वह मोटा स्लाइस, जो किसी ईंट से कम नहीं है, आपके पेट में बची-खुची उस 1% जगह पर भी कब्ज़ा जमाने वाला है जिसे आपने शायद पानी पीने के लिए बचा रखा था। हर बाइट के साथ, वह तला हुआ आलू और मेयोनीज़ का मिश्रण एक ऐसा तूफ़ान खड़ा करता है कि अब आपका पेट सचमुच ‘SOS’ के सिग्नल भेजने लगता है, आपकी बेल्ट कसी हुई महसूस होने लगती है, और माथे पर पसीने की बारीक बूंदें झलकने लगती हैं, लेकिन सामाजिक दबाव और मुफ्त के खाने का लालच आपको रुकने नहीं देता। आप उन नन्हें शैतानों को हँसते-खेलते निगल जाते हैं, यह सोचकर कि चलो अब तो स्नैक्स का दौर खत्म हुआ, अब शायद कुछ देर आराम मिलेगा, लेकिन आप यह नहीं जानते कि आप अभी एक ऐसे तूफ़ान के मुहाने पर खड़े हैं जहाँ से पीछे हटने का रास्ता बंद हो चुका है, और आगे तबाही का मंज़र आपका इंतज़ार कर रहा है।
मुख्य भोजन का डरावना साया: जब ‘ढक्कन’ हटने की आवाज़ ने दिल की धड़कन बढ़ा दी
अब आप उस अवस्था में हैं जहाँ एक घूंट पानी भी आपके गले तक आ सकता है, आपका पेट पिज़्ज़ा के चीज़, पास्ता के मैदे, और बर्गर के आलू से पूरी तरह ‘ब्लॉक’ हो चुका है, आपकी चाल धीमी हो गई है, और आपकी आँखों में एक अजीब सी नींद और भारीपन तैर रहा है; लेकिन तभी, उस विशाल हॉल के दूसरे कोने से एक ऐसी आवाज़ आती है जो किसी भी भरे हुए पेट के लिए मौत की घंटी जैसी होती है—भारी तांबे के बर्तनों के ढक्कन हटाए जाने की खनखनाहट। जी हाँ, जिस ‘स्नैक’ के तांडव को आप अभी तक झेल रहे थे, जिसे आप नासमझी में ‘खाना’ मान बैठे थे, वह तो केवल एक झांकी थी, असली ‘महाभारत’ तो अब शुरू होने वाली है क्योंकि वेटर ने अभी-अभी ‘बटर चिकन’, ‘दाल मखनी’, और ‘शाही पनीर’ के उन विशालकाय पतीलों से ढक्कन हटाया है, और उनसे निकलती हुई वह शाही, रसीली, और घी में डूबी हुई खुशबू ने पूरे वातावरण को अपने कब्जे में ले लिया है। आपका दिमाग सन्न रह जाता है, एक पल के लिए सन्नाटा छा जाता है, आप अपनी भरी हुई प्लेट और तन चुके पेट को देखते हैं और फिर उस भव्य बुफे की तरफ देखते हैं जहाँ 56 भोग सजे हैं; यह वह क्षण है जब आपको एहसास होता है कि अंग्रेजों का सैंडविच तो बस एक मज़ाक था, असली धोखा तो आपके अपने लोगों ने ‘स्नैक्स’ के नाम पर आपके साथ किया है। आपकी अंतरात्मा चीखती है कि “नहीं, अब और नहीं,” लेकिन तभी आपकी नाक में तंदूरी रोटियों और बटर नान की वह सोंधी महक घुसती है, और एक नई, असंभव सी भूख फिर से जागने लगती है, जो एक भयंकर और अंतिम संघर्ष की ओर इशारा करती है।
झूठा समर्पण और पेट का विश्वासघात: ‘बस करो’ की गूंज और डिनर का तांडव
वह क्षण किसी महाकाव्य के युद्धविराम जैसा प्रतीत होता है, जब मेज़बान की ओर से आने वाली स्नैक्स की अनवरत, क्रूर बमबारी के बीच अचानक मेहमानों के समूह से एक समवेत स्वर में चीख निकलती है—”भाई साहब, बस! अब और नहीं, पेट फट जाएगा!”—यह वह समय है जब भारतीय अतिथि अपनी अभिनय क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं, एक ऐसा नाटकीय दृश्य जहाँ चेहरे पर पड़ाव और तृप्ति का भाव होता है, लेकिन आँखों में एक चोर की भांति उस बंद दरवाजे की ओर ताक-झांक चल रही होती है जिसके पीछे ‘मेन कोर्स’ यानी असली खाना तैयार हो रहा है। कल्पना कीजिये उस मंज़र की जहाँ अंग्रेजों का वह बेचारा, सूखा सैंडविच, जो अपनी दो ब्रेड की परतों के बीच ईमानदारी से लेटा हुआ था, इस भारतीय पाखंड को देखकर शर्म से पानी-पानी हो जाता; क्योंकि यहाँ ‘स्नैक्स’ के नाम पर जो पिछले दो घंटों से पेट के साथ जघन्य अपराध किया गया है—पनीर टिक्का के पहाड़, कबाबों की नदियाँ और समोसे के पिरामिड—उसने पाचन तंत्र की हर सीमा को ध्वस्त कर दिया है, मगर फिर भी, यह ‘बस करो’ की पुकार एक रणनीतिक झूठ है, एक ऐसा कूटनीतिक दांव है जिसका उद्देश्य केवल और केवल मेज़बान को यह जताना है कि हम सभ्य हैं, जबकि हकीकत यह है कि शरीर का हर एक अंग अब उस क्षण की तैयारी कर रहा है जब बुफे (Buffet) से ढक्कन हटाए जाएंगे। वातावरण में भारीपन है, साँसे मसालों के बोझ तले दबी हुई हैं, और शर्ट के बटन अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन जैसे ही वेटर आखिरी प्लेट लेकर जाने लगता है, हर किसी के मन में एक ही खौफनाक सवाल कौंधता है—क्या मैंने पेट में इतनी जगह बचाई है कि शाही पनीर के साथ न्याय कर सकूँ, या फिर वह हरा भरा कबाब मेरी आखिरी गलती साबित होगा?
बफर का गणित और ‘एक चम्मच’ का महाझूठ

जैसे ही ‘खाना लग गया है’ की घोषणा किसी युद्ध के नगाड़े की तरह गूंजती है, कमरे का तापमान और तनाव दोनों एक साथ बढ़ जाते हैं, और वह “बस करो” वाला झूठा समर्पण अब एक क्रूर मजाक बन जाता है क्योंकि वही लोग, जो एक मिनट पहले अपनी तोंद पर हाथ फेरते हुए कसम खा रहे थे कि अब एक निवाला भी नीचे नहीं उतरेगा, वे अब अपनी कुर्सियों से ऐसे उठ खड़े होते हैं मानो किसी अदृश्य चुंबक ने उन्हें खाने की मेज की ओर खींच लिया हो। यहाँ अंग्रेजों के सैंडविच की सादगी और भारतीय महाभोज की जटिलता के बीच का अंतर सबसे विकराल रूप में सामने आता है; एक अंग्रेज अपने सैंडविच के बाद ‘फुल’ हो जाता है और बात खत्म हो जाती है, लेकिन एक भारतीय के लिए ‘स्नैक्स’ केवल वार्म-अप था, एक नेट-प्रैक्टिस थी, और असली मैच तो अब शुरू हुआ है जहाँ प्लेट का गणित और पेट का भूगोल आपस में टकराने वाले हैं। वे धीरे-धीरे बुफे की कतार में लगते हैं, अपने मन को यह झूठा दिलासा देते हुए कि “मैं तो सिर्फ चखने के लिए थोड़ा सा लूँगा,” लेकिन जैसे ही वे दाल मखनी की उस मखमली, मक्खन में डूबी हुई सतह को देखते हैं, या नान की उस कुरकुरी परत से उठती हुई भाप को महसूस करते हैं, उनका सारा आत्म-संयम ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है। यह वह क्षण है जब दिमाग कहता है ‘रुक जाओ’, मगर हाथ कांपते हुए उस भारी-भरकम करछुल को उठा लेता है और प्लेट पर चावल का एक और पहाड़ खड़ा कर देता है, जबकि बगल में खड़ा व्यक्ति, जो खुद को ‘डाइट’ पर बता रहा था, अब अपनी प्लेट में जगह बनाने के लिए रायते को ग्रेवी के ऊपर डालने का जघन्य पाप कर रहा है। क्या यह पेट के साथ धोखा नहीं है कि जिस जगह को हवा के लिए भी तरसना पड़ रहा है, वहां अब मलाई कोफ्ता अपनी जगह बनाने के लिए जबरदस्ती घुसपैठ करने को तैयार बैठा है?
अंतिम प्रहार: जब ‘सैंडविच’ की सभ्यता ‘शाही पनीर’ के सामने घुटने टेक देती है
क्लाइमेक्स अब अपने चरम पर है, और यह दृश्य किसी त्रासदी से कम नहीं है जहाँ मानव इच्छाशक्ति मसालों की खुशबू के सामने नतमस्तक हो चुकी है; प्लेटें अब भोजन रखने का पात्र नहीं, बल्कि एक युद्धक्षेत्र बन चुकी हैं जहाँ हर व्यंजन एक-दूसरे के ऊपर चढ़ा हुआ है—सलाद के ऊपर आचार का हमला, पापड़ के नीचे दबी हुई मिक्स वेज की कराह, और इन सबके बीच में वह अतिथि जो अपनी सांसें रोककर, पसीने से लथपथ होकर, इस असंभव मिशन को पूरा करने में जुटा है। अंग्रेजों का वह सैंडविच, जो अपनी संयमित सीमाओं में बंधा था, इस अराजकता को देखकर कोमा में चला जाता, क्योंकि यहाँ कोई सीमा नहीं है, कोई नियम नहीं है, केवल एक आदिम भूख है जो ‘बस करो’ कहने के बावजूद एक और पूरी (Puri) उठाने के लिए हाथ बढ़ा देती है। यह ‘मोमेंट ऑफ ट्रुथ’ यानी सत्य का क्षण है जब व्यक्ति को एहसास होता है कि उसने ‘स्नैक्स’ के चक्रव्यूह में फंसकर कितनी बड़ी गलती की है, लेकिन अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं है क्योंकि मेज़बान की पैनी नज़रें आप पर टिकी हैं और प्लेट में खाना छोड़ना भारतीय संस्कृति में किसी अपराध से कम नहीं माना जाता। हर निवाला अब एक संघर्ष है, हर घूंट एक चुनौती, और पेट के अंदर चल रहा गृहयुद्ध अब अपने अंतिम चरण में है जहाँ पाचन तंत्र ने सफेद झंडा लहरा दिया है, लेकिन जुबान का लालच अभी भी हार मानने को तैयार नहीं है। और ठीक उसी वक्त, जब आपको लगता है कि प्रलय आ चुकी है और अब इस शरीर में पानी की एक बूंद की भी गुंजाइश नहीं बची है, तभी कमरे के दूसरे कोने से एक ऐसी आवाज़ आती है जो रूह को कंपा देती है, एक ऐसी घोषणा जो इस ‘स्नैक्स’ और ‘डিনার’ के धोखे को उसके सबसे भयानक अंजाम तक ले जाती है—क्या आप उस अंतिम, मीठे वार का सामना करने के लिए तैयार हैं जो अभी परोसा जाना बाकी है?
अधिनियम ४: पाश्चात्य भ्रम का अंत और भारतीय आत्मा की तृप्ति – वह ‘सैंडविच’ जिसे पेट ने नकारा!
उस आधुनिक, वातानुकूलित कैफे की कृत्रिम रोशनी से बाहर निकलते ही, मेरे पेट में वह अजीब सा भारीपन था जो तृप्ति का नहीं, बल्कि एक महंगे धोखे का सूचक होता है; मैंने अभी-अभी एक तथाकथित ‘विशालकाय’ क्लब सैंडविच खाया था, जिसके तीन तलों के बीच दबी हुई मेयोनेज़, ठंडी सब्जियां और रबर जैसा पनीर अब मेरे जठराग्नि (digestion) के साथ एक मौन युद्ध लड़ रहे थे, लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि मेरा दिमाग अभी भी उस आदिम सिग्नल को खोज रहा था जो कहता है, “हाँ, अब भोजन संपन्न हुआ,” क्योंकि एक भारतीय के लिए, चाहे उसने कितना भी पनीर और ब्रेड क्यों न निगल लिया हो, जब तक गर्म तवे से उतरी हुई गेहूं की रोटी और हल्दी-नमक के सही संतुलन वाली सब्जी का निवाला हलक से नीचे नहीं उतरता, तब तक शरीर उसे ‘खाना’ मानने से साफ़ इंकार कर देता है, और यह केवल भूख का सवाल नहीं था, बल्कि यह सदियों पुराने उन संस्कारों का विद्रोह था जो मानते हैं कि ब्रेड केवल बीमारों का नाश्ता है और असली ताकत तो उस ‘अन्न’ में है जिसे किसान पसीने से सींचता है, न कि उस मैदे में जिसे मशीनों ने ब्लीच किया है; सड़क पर चलते हुए मुझे अपनी ही मूर्खता पर हंसी आ रही थी कि मैंने ‘स्नैक्स’ के नाम पर इतना कुछ खा लिया जो वजन में पत्थर जैसा भारी था लेकिन रूह को छूने में हवा जैसा हल्का, और जैसे-जैसे मैं अपने घर की ओर कदम बढ़ा रहा था, मेरे भीतर का वह देसी आदमी जाग रहा था जो जानता था कि यह सैंडविच केवल एक ‘ट्रेलर’ था, पूरी ‘पिक्चर’ अभी बाकी थी क्योंकि पेट ने भले ही हार मान ली हो, पर मन अभी भी उस अंतिम सत्य की तलाश में था जो केवल घर की रसोई में ही मिल सकता है, जहाँ मसालों की महक किसी भी विदेशी परफ्यूम से ज्यादा मादक होती है। क्या आप जानते हैं कि उस रात घर की देहरी पर कदम रखते ही मेरे साथ क्या होने वाला था, जब उस सैंडविच के अहंकार का सामना माँ के हाथ की बनी दाल के स्वाभिमान से होने वाला था?
घर वापसी: हींग और जीरे के तड़के की वह पुकार जो आत्मा को झकझोर देती है
जैसे ही मैंने अपनी जेब से चाबी निकाली और ताले में घुमाई, दरवाजे के उस पार से एक ऐसी सुगंध मेरी नासिका से टकराई जिसने मेरे भीतर के सैंडविच-जनित अपराधबोध को और गहरा कर दिया; वह खुशबू किसी मंहगे इटैलियन हर्ब की नहीं थी, बल्कि वह शुद्ध देसी घी में तड़कते हुए जीरे, हींग और सूखी लाल मिर्च का वह दिव्य संयोजन था जो किसी भी भारतीय की थकी हुई आत्मा को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखता है, और उस क्षण मुझे एहसास हुआ कि मैं चाहे दुनिया के किसी भी कोने में चला जाऊं, चाहे कितने भी ‘बर्गर’, ‘पिज़्ज़ा’ या ‘सैंडविच’ खा लूँ, वे सब केवल पेट भरने का एक यांत्रिक कृत्य हैं, जबकि घर का बना वह सादा भोजन एक आध्यात्मिक अनुभव है जो सीधे हृदय से जुड़ा होता है; मैंने जूते उतारते समय खुद से झूठ बोलने की कोशिश की कि “मेरा पेट भरा हुआ है, मैं खाना नहीं खाऊंगा,” लेकिन मेरे अवचेतन मन ने उस विचार को उसी तरह खारिज कर दिया जैसे हम सैंडविच के किनारे के कड़े हिस्सों को काट कर फेंक देते हैं, क्योंकि रसोई से बर्तनों के टकराने की आवाज़ और कुकर की वह अंतिम सीटी किसी संगीत की तरह बज रही थी जो यह ऐलान कर रही थी कि “बेटा, बाहर का कचरा अपनी जगह है, लेकिन सुकून तो इसी थाली में मिलेगा,” और उस वक्त मैंने अपनी पत्नी को रोटियों पर घी चुपड़ते हुए देखा, तो वह दृश्य मुझे किसी भी मिशेलिन स्टार रेस्टोरेंट की सजावट से कहीं अधिक भव्य और पवित्र लगा, जहाँ भोजन केवल पकाया नहीं जाता, बल्कि उसे परोसने में प्रेम और चिंता का वह अदृश्य मसाला मिलाया जाता है जो दुनिया की किसी रेसिपी बुक में नहीं मिलता; मैंने संकोच के साथ डायनिंग टेबल की कुर्सी खींची, यह जानते हुए भी कि मेरे पेट में उस ‘मैदे के दानव’ ने जगह घेर रखी है, लेकिन फिर भी मेरी आँखों ने उस पीली दाल और भिंडी की सब्जी को ऐसे देखा जैसे किसी प्यासे ने रेगिस्तान में ओएसिस देख लिया हो। लेकिन क्या मेरा पेट, जो उस पश्चिमी घुसपैठिये (सैंडविच) से भरा हुआ था, इस शुद्ध भारतीय प्रेम को स्वीकार करने के लिए जगह बना पाएगा, या फिर आज रात एक धर्मसंकट खड़ा होने वाला था?

अंतिम सत्य: एक निवाला और ‘बाहर के खाने’ का पूर्ण विसर्जन
अंततः, वह क्षण आ ही गया जब तर्क और विज्ञान हार गए और भावना जीत गई; मैंने उस गरम, फूली हुई रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा, उसे उंगलियों के बीच महसूस किया—वह स्पर्श जो न तो बहुत सख्त था और न ही बहुत मुलायम, बस एकदम सही, जैसे माँ का आलिंगन—और उसे उस गाढ़ी, रसीली दाल में डुबोया जहाँ एक छोटा सा घी का द्वीप तैर रहा था, और जैसे ही वह निवाला मेरे मुंह में गया, एक चमत्कार हुआ; वह भारीपन, वह ‘ब्लोटिंग’, वह अजीब सा स्वाद जो सैंडविच ने छोड़ा था, सब एक ही पल में गायब हो गए, मानो सूर्य के उदय होते ही कोहरा छंट जाता है, क्योंकि उस निवाले में केवल कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन नहीं थे, उसमें ‘घर’ का स्वाद था, उसमें वह सुरक्षा थी जो कहती है कि “सब ठीक हो जाएगा,” और मैंने महसूस किया कि हम भारतीय चाहे कितना भी आधुनिक होने का ढोंग कर लें, हमारी ‘डिफ़ॉल्ट सेटिंग’ दाल-रोटी-सब्जी ही है, जिसे हम बदल नहीं सकते, क्योंकि बाहर का खाना एक ‘अफेयर’ (affair) की तरह हो सकता है जो कुछ पल के लिए रोमांचक लगता है, लेकिन घर का खाना वह ‘शादी’ है जो जीवन भर साथ निभाती है और मुश्किल वक्त में सुकून देती है; मैंने सोचा था कि मैं केवल एक कौर चखूंगा, लेकिन पता ही नहीं चला कि कब वह एक रोटी, फिर दूसरी, और फिर तीसरी रोटी मेरी थाली से गायब हो गई, और वह सैंडविच जो कुछ देर पहले तक मेरे पेट में अकड़ कर बैठा था, अब शर्मिंदा होकर कहीं कोने में दुबक गया था, यह स्वीकार करते हुए कि भारतवर्ष में ‘स्नैक्स’ केवल एक भ्रम है, एक समय का खिलवाड़ है, लेकिन सत्य तो केवल ‘महाभोज’ यानी अपनी थाली है; और भोजन समाप्त करने के बाद, जब मैंने पानी का गिलास पिया और वह एक संतुष्टि वाली डकार ली, तो मुझे जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान प्राप्त हुआ कि पाश्चात्य सभ्यता ने हमें घड़ियाँ दी होंगी, लेकिन समय को रोकने का जादू तो हमारी भारतीय थाली में ही है। पर क्या अगली बार जब दोस्तों के साथ बाहर जाने का प्लान बनेगा, तो क्या मैं इस सबक को याद रख पाऊंगा, या फिर वह ‘चीज़-बर्स्ट’ का मायाजाल मुझे फिर से अपनी ओर खींच लेगा और यह चक्र पुनः प्रारंभ हो जाएगा?
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