सितारों की महफिल और अंधेरे का साया: एक अनकही दास्तां की शुरुआत
दिल्ली की उस कड़कड़ाती ठंड में मल्होत्रा मेंशन किसी दुल्हन की तरह सजा हुआ था, जहाँ रोशनी का ऐसा सैलाब उमड़ा था कि रात को भी दिन होने का भ्रम हो रहा था; हर तरफ मखमली कालीनों की बिसात, हवा में तैरती केसर और इलायची की भीनी-भीनी खुशबू, और शहनाई की गूंज जो सीधे दिल में उतर रही थी, सब कुछ इतना भव्य था कि देखने वालों की आँखें चौंधिया जाएं। दूल्हा, आदित्य, अपनी शेरवानी में किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था, जिसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, लेकिन उसके आसपास का माहौल शोर, हंसी और बेहिसाब दौलत के प्रदर्शन से भरा हुआ था, जहाँ मेहमानों की कलाईयों में बंधी घड़ियाँ और गले के हारों की कीमत शायद किसी छोटे शहर की पूरी संपत्ति के बराबर रही होगी।

मेजों पर सजा खाना सिर्फ खाना नहीं था, बल्कि दुनिया भर के जायकों का एक ऐसा मेला था जहाँ पनीर की दस किस्में, पिघलता हुआ मक्खन, तंदूर से निकलती गरमा-गरम रोटियां और मिठाइयों के पहाड़ यह चीख-चीख कर बता रहे थे कि यहाँ भूख का कोई नामोनिशान नहीं है, यहाँ सिर्फ ‘ज़्यादा’ की अहमियत है। लेकिन इसी चकाचौंध, इसी दौलत के बेहोश कर देने वाले नशे और कहकहों के बीच, एक नन्ही, कांपती हुई परछाई मुख्य द्वार के पास खड़ी थी, जिसके फटे हुए कपड़ों से झांकती हड्डियाँ और धंसी हुई आँखें इस बात का सबूत थीं कि दुनिया में जन्नत और जहन्नुम एक ही दीवार के आर-पार बसते हैं; वह सात साल की बच्ची, जिसके पैरों में चप्पल तक नहीं थी, उस आलीशान गेट के पीछे छिपी, अपनी सूखी जीभ को होठों पर फेर रही थी, क्योंकि हवा में तैरती बासमती चावलों की महक उसके लिए किसी सजा से कम नहीं थी, जो उसकी आंतों को मरोड़ रही थी और उसे उस लक्ष्मण रेखा को पार करने के लिए उकसा रही थी जिसे समाज ने अमीर और गरीब के बीच खींचा है। वह डरी हुई थी, सहमी हुई थी, लेकिन उसके पेट की आग ने उसके डर को जलाकर खाक कर दिया था, और इसी बेबसी में उसने अपना पहला कदम उस मखमली कालीन पर रखा, यह जाने बिना कि उसका यह एक छोटा सा कदम आज रात इस शादी के जश्न को एक ऐसे तूफान में बदल देगा जिसकी कल्पना किसी ने सपनों में भी नहीं की थी।
सोने के महल में एक खामोश घुसपैठिया और भूख की तड़प
जैसे ही उस बच्ची ने भीड़ के बीच अपनी जगह बनाई, उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में आ गई हो, जहाँ लोग नहीं बल्कि चलते-फिरते पुतले थे जो रेशम और सोने में लदे हुए थे, और जिनकी हंसी में एक ऐसी खनक थी जो उसके कानों को चुभ रही थी; वह अपनी मैली कुचैली फ्रॉक को समेटती हुई, मेहमानों की नज़रों से बचते हुए मेजों की तरफ बढ़ रही थी, उसका छोटा सा शरीर विशाल स्तंभों और फूलों की सजावट के पीछे छिपने की कोशिश कर रहा था। उसकी नज़रों के सामने वह नज़ारा था जिसे देखकर उसके मुंह में पानी और आँखों में आंसू एक साथ आ गए—बर्बादी का ऐसा मंज़र जहाँ लोग अपनी प्लेटों में पहाड़ों जितना खाना भर रहे थे और दो निवाले खाकर उसे डस्टबिन के हवाले कर रहे थे, जबकि वह पिछले दो दिनों से एक दाने के लिए तरस रही थी। शाही पनीर की ग्रेवी का रंग, गुलाब जामुन की चाशनी की चमक और दाल मखनी की खुशबू ने उसे सुध-बुध खोने पर मजबूर कर दिया था; उसे अब न तो वो गार्ड्स दिखाई दे रहे थे जो उसे धक्के मारकर बाहर निकाल सकते थे, और न ही वो संभ्रांत महिलाएं जो उसे कीड़े-मकौड़े की तरह देख रही थीं, उसे दिख रही थी तो बस एक प्लेट जिस पर किसी ने आधा खाया हुआ बटर नान छोड़ दिया था। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, जैसे कोई हथौड़ा उसके सीने में बज रहा हो, और हर धड़कन के साथ एक ही आवाज़ आ रही थी—’खाना’। उसने अपने छोटे, कांपते हुए, धूल से सने हाथों को आगे बढ़ाया, दुनिया की सारी शर्म और डर को ताक पर रखकर, सिर्फ उस एक टुकड़े को उठाने के लिए जो उसके लिए जीवन था लेकिन दूसरों के लिए कचरा; वह अभी उस प्लेट को छूने ही वाली थी, उसकी उंगलियां उस ठंडी रोटी के टुकड़े को महसूस करने ही वाली थीं कि अचानक संगीत का शोर उसके कानों में धीमा पड़ गया और उसे अपनी पीठ पर किसी की तीखी, चुभती हुई नज़रों का अहसास हुआ जो उसे चीरती हुई आर-पार हो रही थीं।
सन्नाटे का शोर और दूल्हे का जानलेवा फैसला
और फिर वह हुआ जिसका डर उसे अपनी माँ की कहानियों में हमेशा लगता था—जैसे ही उसकी उंगलियों ने उस रोटी के टुकड़े को मुट्ठी में भींचा, एक कड़कड़ाती हुई आवाज़ ने पूरे माहौल को चीर कर रख दिया, “ए लडकी! हिम्मत कैसे हुई तेरी यहाँ घुसने की?” यह आवाज़ किसी और की नहीं बल्कि एक वेटर की थी जिसने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया था, और देखते ही देखते वहां मौजूद हंसी-मजाक का शोर एक गहरे, भयानक सन्नाटे में बदल गया। सैकड़ों निगाहें एक साथ उस नन्ही सी जान पर टिक गईं, जो अब थर-थर कांप रही थी, उसके हाथ में वह जूठा खाना अभी भी दबा हुआ था जिसे वह छोड़ने को तैयार नहीं थी; मेहमानों के चेहरों पर घृणा के भाव थे, कुछ लोग अपनी नाक सिकोड़ रहे थे जैसे कोई बदबू आ गई हो, और कुछ “चोर-चोर” कहकर कानाफूसी कर रहे थे। एक भारी-भरकम रिश्तेदार ने आगे बढ़कर उसका हाथ झटक दिया, जिससे वह रोटी का टुकड़ा ज़मीन पर गिर गया और उस बच्ची की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा, लेकिन वह रोई नहीं, बस उस गिरे हुए खाने को देखती रही। अपमान की आग भड़क चुकी थी, और लोग उसे धक्के देकर बाहर निकालने ही वाले थे कि तभी स्टेज पर एक हलचल हुई—आदित्य, वह दूल्हा जो अब तक चुपचाप सब देख रहा था, अपनी जगह से उठा और उसकी आंखों में एक ऐसा अंगारा दहक रहा था जिसने वहां मौजूद हर शख्स को सहमने पर मजबूर कर दिया। उसने माइक हाथ में लिया नहीं, बल्कि फेंक दिया, और भारी कदमों से सीढ़ियां उतरते हुए उस भीड़ को चीरता हुआ उस बच्ची की तरफ बढ़ा; उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि एक ऐसा दर्द और रहस्य था जिसे कोई समझ नहीं पा रहा था, और जैसे ही वह उस बच्ची के सामने घुटनों के बल बैठा, उसने अपनी पगड़ी उतारकर ज़मीन पर रख दी। सन्नाटा इतना गहरा था कि सुई गिरने की आवाज़ भी सुनाई दे जाए, सबने सोचा वह उसे मारेगा या पुलिस को बुलाएगा, लेकिन आदित्य ने उस बच्ची के आंसुओं को अपनी शेरवानी की आस्तीन से पोंछा और फिर भीड़ की तरफ मुड़कर, अपनी कांपती हुई आवाज़ में एक ऐसा सच बोलने के लिए मुंह खोला, जिसने वहां खड़े हर इंसान के पैरों तले से ज़मीन खिसका दी और शादी की उस खुशमिजाज रात को मातम और पश्चाताप के समुद्र में बदल दिया।
रंग-बिरंगी रोशनी के पीछे छिपी भूख की एक काली परछाई
शादी का वह आलीशान समारोह किसी स्वर्ग के दृश्य से कम नहीं था, जहाँ आसमान से टपकतीं बड़ी-बड़ी झूमरों की रोशनी में हीरे-जवाहरात से लदे मेहमान अपनी अमीरी का बेधड़क प्रदर्शन कर रहे थे, और हवा में तैरती हुई देसी घी, केसरिया बिरयानी, और मक्खन में डूबे हुए लजीज व्यंजनों की महक किसी भी इंसान की नीयत डगमगाने के लिए काफी थी, लेकिन इसी चकाचौंध के बीच, पंडाल के एक अंधेरे कोने में, फटे-पुराने कपड़ों में लिपटी वह आठ साल की मासूम बच्ची, जिसकी आँखों में शरारत नहीं बल्कि कई दिनों की भूख का खौफनाक सन्नाटा था, अपनी सूखी हुई जीभ को होंठों पर फेरते हुए उन सोने की थालियों को ऐसे देख रही थी जैसे कोई प्यासा रेगिस्तान में पानी की एक बूंद को देखता है; उसके पेट के अंदर जल रही भूख की आग उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रही थी, और हर बार जब कोई वेटर खुशबूदार व्यंजनों से भरी ट्रे लेकर उसके पास से गुजरता, तो उसकी नन्ही उंगलियां अनजाने में ही हवा में उठ जाती थीं, मानो वह उस अदृश्य सुगंध को मुट्ठी में कैद कर लेना चाहती हो, मगर उसे अपनी मां की दी हुई वह सख्त हिदायत याद आ जाती थी कि “बड़े लोगों की दुनिया में गरीबों का दिखना भी गुनाह होता है,” फिर भी, जब भूख ने उसके धैर्य के बांध को तोड़ दिया और उसकी अंतड़ियों में मरोड़ उठने लगी, तो उसने अपनी डरी हुई, कांपती निगाहों से चारों तरफ का जायजा लिया, जहाँ लोग अपनी हंसी-ठिठोली और झूठी शान में इतने मगन थे कि उन्हें अपने पैरों के पास रेंगती हुई इस नन्हीं जान का कोई भान नहीं था, और तभी उसकी नजर खान-पान के उस विशाल काउंटर के पास एक मेज पर रखी उस थाली पर पड़ी जिसे किसी अमीरजादे ने शायद सिर्फ एक कौर खाकर छोड़ दिया था, उसमें अभी भी आधा बटर नान और पनीर का एक बड़ा टुकड़ा बचा हुआ था जो उस बच्ची के लिए किसी कोहिनूर हीरे से कम नहीं था। उसने एक गहरी, कांपती हुई सांस ली, अपने मैले-कुचैले दुपट्टे को कसकर कमर में बांधा और भीड़ के शोरगुल में खुद को छिपाते हुए उस दिशा में एक ऐसा कदम बढ़ाया जो न केवल उसकी रात बदलने वाला था, बल्कि इस शादी के जश्न को एक भयानक तमाशे में बदलने की शुरुआत करने वाला था।
सांसों को रोक देने वाला वह खौफनाक लम्हा और पकड़े जाने का डर
वह बच्ची अब मेहमानों के भारी-भरकम लहंगों और शेरवानियों के जंगल के बीच से किसी साये की तरह गुजर रही थी, उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे लग रहा था कि उसकी धड़कन की आवाज डीजे के संगीत को भी चीरकर सबको सुनाई दे जाएगी,

हर कदम पर उसे यह डर सता रहा था कि कहीं किसी की नजर उस पर न पड़ जाए, लेकिन भूख का नशा डर पर भारी पड़ रहा था; वह झुककर, रेंगते हुए, मेजों के नीचे से होती हुई उस जगह के करीब पहुँच रही थी जहाँ वह जूठी थाली रखी थी, और जैसे-जैसे वह करीब आ रही थी, खाने की वह दिव्य खुशबू उसके दिमाग पर हावी होती जा रही थी, उसे अब आसपास के लोगों की बातें, संगीत का शोर या वेटर की आवाजाही सुनाई देना बंद हो गई थी, उसकी दुनिया सिमटकर सिर्फ उस पनीर के टुकड़े तक रह गई थी जो उसे उसकी जिंदगी बचाने का एकमात्र जरिया लग रहा था, और अंततः, जब वह उस मेज के ठीक नीचे पहुंची, तो उसने अपने गंदे, धूल से सने हुए नन्हें हाथ को धीरे से मेजपोश के ऊपर बढ़ाया, उसकी उंगलियां कांप रही थीं और माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, उसने जैसे ही उस थाली के किनारे को अपनी उंगलियों से छुआ, उसे लगा कि उसने दुनिया की सबसे कीमती दौलत पा ली है, लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था, क्योंकि ठीक उसी वक्त, जब वह उस रोटी के टुकड़े को उठाकर अपने मुंह में डालने ही वाली थी कि उसे महसूस हुआ कि समय अचानक थम गया है और उसके ऊपर एक विशाल काली परछाई मंडराने लगी है; इससे पहले कि वह उस निवाले को अपने सूखे गले से नीचे उतार पाती, एक लोहे जैसी सख्त पकड़ ने उसकी कलाई को इतनी जोर से जकड़ लिया कि उसके हाथ से वह रोटी का टुकड़ा छूटकर जमीन पर गिर गया और वह दर्द से चीख उठी, और जब उसने डरते-डरते अपनी नजरें ऊपर उठाईं, तो उसने देखा कि कैटरिंग का इंचार्ज, जिसका चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था और जिसकी आँखों में गरीबों के प्रति नफरत साफ झलक रही थी, उसे ऐसे घूर रहा था मानो उसने कोई खाना नहीं, बल्कि तिजोरी चुरा ली हो, और तभी इंचार्ज ने इतनी जोर से उसे झटका दिया कि वह लड़खड़ाकर बीच रास्ते में गिर पड़ी, और उसकी चीख ने अचानक वहां मौजूद उस हिस्से के सन्नाटे को चीर दिया।
सार्वजनिक अपमान और वह अवांछित खुलासा जिसने सबको चौंका दिया
जैसे ही वह बच्ची जमीन पर गिरी, आसपास का माहौल अचानक बदल गया, संगीत तो बज रहा था लेकिन उस हिस्से में एक अजीब सा तनाव फैल गया, जहाँ रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे-धजे मेहमानों ने अपनी नाक-भौं सिकोड़ते हुए उस दृश्य को देखना शुरू कर दिया, मानो किसी ने उनके आलीशान जश्न में कचरा फेंक दिया हो; कैटरिंग इंचार्ज ने, जो अपनी “ड्यूटी” और वफादारी दिखाने के लिए उतावला हो रहा था, उस रोती-बिलखती बच्ची को कॉलर से पकड़कर घसीटते हुए रोशनी के बीचों-बीच खड़ा कर दिया और अपनी कर्कश आवाज में चिल्लाने लगा, “देखो इस चोर को! हम यहाँ इतनी मेहनत से खाना परोस रहे हैं और ये सड़क छाप भिखारी यहाँ घुसकर मेहमानों का खाना चुरा रही है, इन जैसे लोगों की वजह से ही अच्छे घरों की पार्टियों का माहौल खराब होता है,” और उसकी बात सुनकर वहां खड़ीं कुछ संभ्रांत महिलाएं अपनी महंगी साड़ियों को समेटते हुए पीछे हट गईं, जैसे उस बच्ची के छूने भर से वे मैली हो जाएंगी, जबकि कुछ पुरुषों ने घृणा से थूकते हुए कहा कि “गार्ड्स कहाँ हैं? सिक्योरिटी इतनी ढीली क्यों है?”; वह बच्ची, जो अब तक सिर्फ भूख से तड़प रही थी, अब शर्म और अपमान के आंसुओं में डूब चुकी थी, वह हाथ जोड़कर, सिसकते हुए बार-बार बस यही कह रही थी, “साहब, मैंने चोरी नहीं की, मुझे बहुत भूख लगी थी, वो खाना जूठा था साहब,” लेकिन उसकी मासूम, टूटी हुई आवाज उन पत्थर दिल मेहमानों के कानों तक पहुँचने से पहले ही उनके अहंकार की दीवारों से टकराकर दम तोड़ रही थी, उसे हर तरफ से सिर्फ दुत्कार और हिकारत मिल रही थी, और लग रहा था कि अब उसे धक्के मारकर बाहर फेंक दिया जाएगा और शायद पुलिस के हवाले भी कर दिया जाएगा; अपमान की यह आग तब और भड़क उठी जब दूल्हे के पिता ने आगे बढ़कर चिल्लाते हुए कहा, “इसे तुरंत मेरी नजरों से दूर करो, यह अपशकुन है!”, लेकिन ठीक उसी पल, जब वह मैनेजर उस बच्ची को आखिरी धक्का देने के लिए अपना हाथ उठा रहा था, तभी भीड़ को चीरती हुई एक ऐसी गंभीर और कड़कदार आवाज गूंजी जिसने सबको पत्थर की मूर्ति की तरह जमा दिया—”खबरदार, अगर किसी ने भी उस बच्ची को एक उंगली भी लगाई!”—और जब सबने मुड़कर देखा, तो दूल्हा अपनी शेरवानी संभाले, आँखों में अंगारे लिए उस बच्ची की तरफ बढ़ रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर गुस्सा उस बच्ची के लिए नहीं, बल्कि कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था, और उसने वहां पहुँचकर जो पहला वाक्य बोला, उसने वहां मौजूद हर शख्स के पैरों तले से जमीन खिसका दी।
सन्नाटे की चीख: जब उत्सव का शोर थम गया और एक तूफ़ान मंडप से उतरा
उस आलीशान बैंक्वेट हॉल की चकाचौंध रोशनी के बीच, जहाँ मखमली पर्दों और विदेशी फूलों की महक ने हवा को भारी कर रखा था, वहाँ एक मासूम बच्ची का अपमान किसी नुकीले काँच की तरह चुभ रहा था; सुरक्षा गार्ड की वो खुरदुरी, पत्थर जैसी हथेली उस नन्ही सी जान की पतली कलाई पर ऐसे कस गई थी मानो वह कोई अपराधी हो, और जिस थाली में उसने अपनी भूख मिटाने के लिए बमुश्किल चंद निवाले जमा किए थे, वो एक जोरदार झटके के साथ संगमरमर के फर्श पर जा गिरी, जिससे शाही पनीर की तरी और बटर नान के टुकड़े बिखर गए, ठीक वैसे ही जैसे उस बच्ची का स्वाभिमान उस पल चकनाचूर हो गया था। मेहमानों की भीड़, जो अब तक अपनी हीरों की अंगूठियों और रेशमी साड़ियों की चमक में खोई हुई थी, अचानक इस तमाशे की ओर मुड़ी, लेकिन उनकी आँखों में करुणा नहीं, बल्कि घृणा थी, मानो उस बच्ची की गरीबी ने उनकी महँगी पार्टी की शोभा बिगाड़ दी हो, और वे अपनी नाक सिकोड़ते हुए आपस में फुसफुसाने लगे, “अरे, ये भिखारी यहाँ कैसे आ गई?”, “सिक्योरिटी क्या कर रही है?”, जबकि वह बच्ची, जिसके गालों पर आंसुओं की लकीरें धूल के साथ मिलकर कीचड़ बना रही थीं, अपनी सूजी हुई आँखों से उस बिखरे हुए खाने को देख रही थी जिसे नसीब करना उसके लिए किसी सपने से कम नहीं था। गार्ड ने उसे घसीटते हुए, धक्के मारते हुए मुख्य द्वार की ओर ले जाने का प्रयास किया, उसका लहज़ा इतना क्रूर और आवाज़ इतनी ऊँची थी कि शहनाई की मधुर धुन भी उसके आगे फीकी पड़ गई, और वह बच्ची अपनी टूटी हुई चप्पलों को घिसटते हुए बस इतना ही कह पाई, “साहब, बहुत भूख लगी है,” लेकिन उस पत्थर दिल इंसान पर इसका कोई असर नहीं हुआ, उसने अपना हाथ हवा में उठाया ताकि उस रोती हुई बच्ची को एक तमाचा जड़ सके और उसे हमेशा के लिए बाहर फेंक सके। लेकिन ठीक उसी पल, जब हिंसा का वह हाथ उस मासूम गाल को छूने ही वाला था, पूरे हॉल में एक ऐसी कड़कदार आवाज़ गूँजी जिसने वक्त के पहिये को जाम कर दिया, एक ऐसी दहाड़ जिसने न केवल उस गार्ड के हाथ को हवा में ही जमा दिया बल्कि हर एक मेहमान की सांसें हलक में अटका दीं—”अगर उस बच्ची को एक खरोंच भी आई, तो मैं इस पूरी शादी को अभी, इसी वक्त आग लगा दूँगा!”
दूल्हे का रौद्र रूप: रस्मों की बेड़ियाँ तोड़कर जब सच सामने आया

मंडप पर बैठा दूल्हा, विक्रम, जो अब तक सिर झुकाए रस्मों की अदायगी कर रहा था, अचानक एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा था; उसने अपने सिर पर बंधा हुआ वह कीमती सेहरा, जो फूलों और मोतियों से लदा था, एक झटके में नोचकर फेंक दिया, और उसकी आँखों में जो अंगारे दहक रहे थे, उन्हें देखकर पंडित के मंत्र भी आधे-अधूरे होठों पर ही रुक गए। विक्रम अपने स्थान से ऐसे खड़ा हुआ जैसे कोई सोता हुआ शेर जाग गया हो, उसने अपनी शेरवानी के पल्लू को झटका और बिना किसी की परवाह किए, बिना अपनी दुल्हन या माता-पिता की ओर देखे, वह मंडप की सीढ़ियों से नीचे उतरा, उसके हर एक कदम की धमक लकड़ी के फ्लोर पर ऐसे पड़ रही थी जैसे न्याय का हथौड़ा बज रहा हो। पूरा हॉल, जहाँ कुछ पल पहले तक हंसी-ठिठोली और कानाफूसी का शोर था, अब श्मशान जैसी खामोशी में डूब गया था, लोग अपनी जगहों पर बुत बनकर खड़े थे, उनकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं क्योंकि उन्होंने आज तक किसी दूल्हे को अपनी ही शादी के बीच में इतना क्रोधित और इतना बेकाबू होते नहीं देखा था। विक्रम सीधा उस जगह पहुँचा जहाँ वह गार्ड अभी भी उस बच्ची का हाथ पकड़े खड़ा था, लेकिन अब गार्ड के चेहरे की हेकड़ी गायब हो चुकी थी और उसकी जगह खौफ ने ले ली थी, क्योंकि विक्रम का कद और उसका गुस्सा दोनों ही उस पर हावी हो रहे थे। विक्रम ने एक झटके में गार्ड की कलाई को इतनी जोर से मरोड़ा कि वह दर्द से कराह उठा और उसकी पकड़ ढीली पड़ गई, जिससे वह नन्ही बच्ची मुक्त हो गई, लेकिन वह भागने के बजाय थर-थर कांपते हुए वहीं दुबक गई, उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह राजा जैसा दिखने वाला आदमी उसे बचाने आया है या सजा देने। विक्रम ने गार्ड को धक्का देकर दूर किया और फिर अपनी गहरी, कँपकँपाती हुई आवाज़ में उस भीड़ की ओर उंगली उठाई जो तमाशबीन बनी खड़ी थी, “शर्म नहीं आती तुम लोगों को? लाखों का खाना कूड़ेदान में फेंक सकते हो, लेकिन एक भूखी बच्ची के हलक में दो निवाले जाते देख तुम्हारी रूह कांप जाती है?”—तभी विक्रम ने झुककर उस डरी हुई बच्ची के कंधे पर हाथ रखा, और जैसे ही उस बच्ची ने अपनी बड़ी-बड़ी, भीगी आँखों से विक्रम को देखा, विक्रम के चेहरे के भाव पत्थर से मोम बन गए, और उसने एक ऐसा वाक्य कहा जिसने वहां मौजूद हर शख्स के पैरों तले से जमीन खींच ली।
रहस्य का पर्दाफाश: खून के रिश्तों से गहरा भूख का रिश्ता
विक्रम ने उस गंदी, मैली-कुचैली बच्ची को अपनी गोद में उठा लिया, उसकी महंगी शेरवानी पर लगी धूल और तेल के दागों की परवाह किए बिना, उसने अपनी जेब से एक रेशमी रुमाल निकाला और उस बच्ची का चेहरा पोंछना शुरू किया, यह दृश्य इतना अवास्तविक और चौंकाने वाला था कि दुल्हन भी मंडप से खड़ी होकर यह सब देख रही थी, उसका दिल किसी अनहोनी की आशंका से जोर-जोर से धड़क रहा था। विक्रम ने उस बच्ची को सीने से लगाया, उसकी सिसकियाँ अब विक्रम के कंधे पर गूँज रही थीं, और फिर उसने उस माइक को हाथ में लिया जो पास ही खड़े एंकर के हाथ से छूटने ही वाला था। विक्रम की आवाज़ अब गूंज रही थी, लेकिन उसमें गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा, पुराना दर्द था, एक ऐसा दर्द जिसे उसने बरसों से अपने दिल के तहखाने में छिपा रखा था; उसने अपनी नजरें अपने अमीर ससुर और अपने खुद के माता-पिता पर गड़ा दीं, जो इस अपमान से लाल हो रहे थे। “आप सब सोच रहे हैं कि मैं पागल हो गया हूँ? आप सोच रहे हैं कि मैं एक सड़क छाप भिखारी के लिए अपनी शादी का तमाशा क्यों बना रहा हूँ?” विक्रम हंसा, लेकिन उस हंसी में कड़वाहट थी, “यह बच्ची भिखारी नहीं है… और न ही यह यहाँ भीख मांगने आई है, यह तो अपना वो कर्ज वसूलने आई है जो हम सब पर, और खास तौर पर मुझ पर बरसों से चढ़ा हुआ है।” उसने बच्ची के सिर पर हाथ फेरा और एक गहरी सांस ली, मानो वह उस राज को बाहर निकालने के लिए ताकत जुटा रहा हो जो उसकी जिंदगी बदल देगा। “आज से पंद्रह साल पहले, जब मैं अनाथ था और सड़कों पर दाने-दाने को तरसता था, तब इसी बच्ची के पिता ने अपनी भूखी बेटी के हिस्से का दूध मुझे पिलाकर मेरी जान बचाई थी, और आज वही बेटी मेरी शादी में झूठन उठाने को मजबूर है?” सन्नाटा इतना गहरा था कि अगर सुई भी गिरती तो उसकी आवाज़ बम जैसी लगती, लेकिन विक्रम ने अपनी बात अभी खत्म नहीं की थी, उसने अपनी आँखों में आए आंसुओं को पोंछा और एक ऐसा सच उगला जिसने शादी के मंडप को अदालत के कटघरे में बदल दिया—”और आप लोग जानते हैं वो पिता कौन था? वो कोई और नहीं, बल्कि वही शख्स था जिसे मेरे ससुर ने अपनी फैक्ट्री से चोरी के इल्जाम में मरते दम तक पिटवाया था… आज हिसाब होगा, और वो भी यहीं, इसी वक्त!”
सन्नाटे की चीख और अतीत का वह खौफनाक सच जो दूल्हे के होंठों पर कांप रहा था
मंडप में छाया हुआ वह सन्नाटा किसी भी शोर से ज्यादा बहरा कर देने वाला था, मानो वक्त की नब्ज अचानक थम सी गई हो और हवाओं ने भी अपना रुख उस मासूम, डरी-सहमी बच्ची की ओर मोड़ लिया हो, जो अभी भी अपने नन्हे, कांपते हाथों में वह जूठी प्लेट पकड़े खड़ी थी, जबकि दूल्हा विक्रम, जिसकी आंखों में अब तक अपनी नई जिंदगी की चमक थी, अब एक अजीब सी नमी और ज्वालामुखी जैसा दर्द लिए उस बच्ची के सामने घुटनों के बल बैठा था। वहां मौजूद सैकड़ों मेहमान, जो कुछ क्षण पहले तक अपनी महंगी साड़ियों, हीरे के हारों और रसूखदार बातों में मशगूल थे, अब बुतों की तरह पत्थर होकर उस दृश्य को देख रहे थे, उनकी सांसें हलक में अटकी थीं क्योंकि विक्रम ने न केवल उस सिक्योरिटी गार्ड का हाथ झटक दिया था जो उस ‘कीड़े’ को बाहर फेंकने वाला था, बल्कि उसने उस गंदी, मैली-कुचैली बच्ची को अपनी गोद में उठाने की बजाय, उसके चरणों में झुककर अपनी पगड़ी उतारने की जो चेष्टा की थी, उसने पूरे हॉल के वातावरण को एक ऐसे रहस्यमयी तनाव से भर दिया था जिसे शब्दों में पिरोना असंभव था। विक्रम का चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था, और उसका गला रुंधा हुआ था, लेकिन उसकी आंखों में एक ऐसा अंगारा था जो वहां खड़े हर उस शख्स को जलाकर राख कर देने की ताकत रखता था जिसने उस बच्ची को हिकारत की नज़र से देखा था; उसने माइक को अपने कांपते हाथों में थामा, और उसकी आवाज़, जो आमतौर पर आत्मविश्वास से लबरेज होती थी, आज टूटे हुए कांच की तरह बिखर रही थी जब उसने कहा, “तुम सब जिसे कचरा समझ रहे हो, जिसे धक्के देकर बाहर निकालना चाहते हो… क्या तुम जानते भी हो कि इस बच्ची की रगों में किसका खून दौड़ रहा है, या यह कौन है जिसके एक निवाले के लिए तरसने पर तुम सब अपनी नाक-भौं सिकोड़ रहे हो?”—उसने एक लम्बी, भारी सांस ली और अपनी गीली पलकें उठाकर सीधे अपनी दुल्हन और अपने अमीर रिश्तेदारों की आँखों में झाँकते हुए वह बात कह दी, जिसकी गूंज ने वहां मौजूद हर इंसान की रूह को झकझोर कर रख दिया।
दस साल पुराना कर्ज और एक निवाले की कीमत जो सोने से भी भारी थी
विक्रम की आवाज़ अब पूरे हॉल में गूंज रही थी, और वह एक कहानीकार की तरह नहीं, बल्कि एक घायल शेर की तरह दहाड़ रहा था, अतीत के उन पन्नों को पलट रहा था जिन पर धूल और दर्द की परतें जमी थीं; उसने बताना शुरू किया कि कैसे आज से ठीक पंद्रह साल पहले, जब वह अनाथ था, लावारिस था, और इसी शहर की बेरहम सड़कों पर दाने-दाने को मोहताज होकर भटकता था, तब न उसके तन पर कपड़े थे और न ही पेट में अन्न का एक दाना, और कैसे भरी बरसात की एक काली रात में जब वह भूख से तड़पकर फुटपाथ पर दम तोड़ने ही वाला था, तब एक रिक्शा चालक ने, जिसके पास खुद के बच्चों को खिलाने के लिए पर्याप्त नहीं था, अपनी टिफिन का आधा हिस्सा उसे खिलाकर उसकी जान बचाई थी। विक्रम के शब्दों में इतना दर्द था कि पत्थर दिल इंसान भी पिघल जाए, वह बता रहा था कि कैसे उस रिक्शा वाले ‘रामू काका’ ने उसे पढ़ाया, उसे जीने का मकसद दिया, और खुद अपनी बीमारी का इलाज नहीं करवाया ताकि विक्रम की कॉलेज की फीस भरी जा सके, और कैसे विक्रम के विदेश जाने के बाद वह फरिश्ता गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गया, बीमारी और गरीबी से लड़ते-लड़ते दुनिया छोड़ गया, और पीछे छोड़ गया अपनी इस नन्ही सी फूल जैसी बेटी को, जो आज उसी शहर में, उसी विक्रम की शादी में, भूख मिटाने के लिए जूठन उठाने को मजबूर थी। मेहमानों के चेहरों पर जो घृणा थी, वह अब शर्मिंदगी के स्याह रंगों में बदल रही थी, क्योंकि विक्रम ने रोते हुए उस बच्ची को अपनी छाती से लगा लिया और चीखकर कहा, “आज मैं जो कुछ भी हूँ, जिस अरबों के साम्राज्य का मालिक हूँ, वह सब इस बच्ची के पिता की दी हुई भीख है, और आज उसी दाता की बेटी को तुम लोगों ने चोर कहा… धिक्कार है मेरी दौलत पर और धिक्कार है तुम सबकी इंसानियत पर!”—और तभी उसने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने शादी के मंडप में एक नया तूफ़ान खड़ा कर दिया, एक ऐसा संकल्प जो रस्मो-रिवाज़ों से कहीं ऊपर था।

पछतावे के आंसू और मेहमानों के पैरों तले से खिसकती हुई जमीन
जैसे ही विक्रम ने यह खुलासा किया कि यह बच्ची कोई भिखारिन नहीं बल्कि उसके ‘पिता-तुल्य’ उपकारकर्ता की इकलौती वारिस है, हॉल में एक अजीब सा मातम और साथ ही एक पवित्रता का भाव छा गया; वे महिलाएं जो अपनी रेशमी साड़ियों को उस बच्ची की परछाई से भी बचा रही थीं, अब शर्म से पानी-पानी हो रही थीं, उनकी नज़रें झुक गई थीं और कईयों की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले थे, क्योंकि उन्हें अहसास हो गया था कि उन्होंने भगवान के रूप को पहचानने में कितनी बड़ी भूल कर दी थी। विक्रम की दुल्हन, प्रिया, जो अब तक स्तब्ध खड़ी थी, दौड़कर आई और उसने अपनी हिचकिचाहट को तोड़ते हुए उस बच्ची को गले लगा लिया, अपने महंगे लहंगे की परवाह किए बिना उसने उस बच्ची के आँसू पोंछे और वही जूठी प्लेट, जिसे लेकर इतना हंगामा हुआ था, उसे एक तरफ फेंककर अपने हाथों से चांदी की थाली में छप्पन भोग परोसने लगी। यह दृश्य इतना भावुक था कि वेटर से लेकर वीडियोग्राफर तक, हर कोई अपनी सुध-बुध खो बैठा था; वहां का माहौल, जो कुछ देर पहले अहंकार और दिखावे से भरा था, अब करुणा और आत्मीयता के मंदिर में बदल चुका था, जहाँ अमीर और गरीब का भेद मिट गया था। विक्रम ने उस बच्ची को गोद में उठाया और सीधे मुख्य सोफे पर, जहाँ दूल्हा-दुल्हन बैठते हैं, वहां बिठा दिया, और खुद उसके बगल में खड़े होकर ऐलान किया कि आज से यह बच्ची उसकी बेटी है, उसके घर की लक्ष्मी है, और उसकी सारी जायदाद की पहली हकदार है। मेहमानों के लिए यह तमाचा इतना जोरदार था कि किसी के मुंह से एक शब्द नहीं निकल रहा था, बस सिसकियों की आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन कहानी का अंत अभी बाकी था क्योंकि उस बच्ची ने कुछ ऐसा किया जिसने सबके दिलों को हमेशा के लिए बदल दिया—उसने अपनी थाली से एक गुलाब जामुन उठाया और कांपते हाथों से विक्रम के मुंह में डाल दिया।
मानवता की जीत और एक नई शुरुआत का सूर्योदय
शादी की शहनाइयाँ अब दोबारा बजने लगी थीं, लेकिन अब उनकी धुन में एक अलग ही रूहानियत थी, एक ऐसी मिठास थी जो दिखावे के तड़के से नहीं बल्कि सच्चे प्रेम और इंसानियत के एहसास से पैदा हुई थी; विक्रम और प्रिया की शादी संपन्न हुई, लेकिन उस रात का असली आकर्षण वह नन्ही परी थी जो अब नए कपड़ों में, फूलों के बीच बैठी मुस्कुरा रही थी, और जिसे देखने के लिए अब हर कोई तरस रहा था, हर कोई उसका आशीर्वाद लेना चाहता था। उस रात वहां मौजूद हर शख्स एक बहुत बड़ा जीवन का पाठ पढ़कर जा रहा था—कि इंसान की कीमत उसके कपड़ों से नहीं, उसके कर्मों और उसके दिल से होती है, और कभी-कभी सबसे मैली गुदड़ी में ही सबसे कीमती लाल छिपा होता है। भोजन का स्वाद भी आज बदला हुआ लग रहा था, मानो उस एक सच ने हर व्यंजन में अमृत घोल दिया हो; लोगों ने जाना कि भूख का कोई धर्म नहीं होता और मदद का कोई मोल नहीं होता, और जिसे हम आज ठुकरा रहे हैं, हो सकता है कल वही हमारा तारणहार हो या हमारे किसी अपने का रक्षक। विक्रम ने उस बच्ची का हाथ थामकर जब विदा ली, तो वह सिर्फ़ अपनी दुल्हन को नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के सुकून को, अपने अतीत के कर्ज को, और अपने भविष्य की रोशनी को साथ ले जा रहा था। और इस तरह, एक शादी जो सिर्फ़ दो परिवारों का मिलन बनने वाली थी, वह इंसानियत के पुनर्जन्म का उत्सव बन गई, जहाँ एक भूखी बच्ची के आंसुओं ने पत्थरों को भी मोम कर दिया और दुनिया को सिखा दिया कि असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि किसी के आंसू पोंछने की औकात में होती है—और इसी सीख के साथ, रात के अंधेरे को चीरकर एक नई, सुनहरी सुबह की किरण वहां मौजूद हर दिल में उतर गई।
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